असमय चला गया जनजातीय अस्मिता के संघर्ष का यह उभरता नायक

Abhy Flavian XaXA (अभय फलैवियन जाजा) का नाम आप ने शायद नहीं सुना हो. पर पिछले एक दशक में वह जनजातीय अस्मिता के संघर्ष के उभरते नायक बनते जा रहे थे. वह बेवक्त दुनिया छोड़ चुके हैं.

Abhay Flavian Xaxa

By Irshadul Haque

उनकी योग्यता को फोर्ड फाउंडेशन ने पहचानी थी. उनकी क्षमता से प्रभावित हो कर उन्हें अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप दी थी.इंग्लैंड के University of Sussex और जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त अभय ने आदिवासी व जनजातीय अस्मिता के संघर्ष को बड़ी तेजी से आगे बढ़ाया. बमुश्किल अपने डेढ़ दशक के करियर में अभय ने हाशिये के लोगों के दर्द को इतना समझ लिया था कि कम उम्र में ही वह खुद इस दर्द को सह नहीं सके और कई अधूरे काम छोड़ कर चले गये.

अभय से मेरा सिर्फ यह रिश्ता था कि हम दोनों Ford Foundation के एलुमनाई रहे. चंद कार्यक्रमों में औपचारिक मुलाकातों के अलावा हम व्यक्तिगत तौर पर एक दूसरे को बहुत नहीं जान पाये. पर मैं उनके कार्यों से बेहद प्रभावित रहा. उनकी मृत्यु की खबर फोर्ड फाउंडेशन की एलुमनाई जूही से मिली तो मैं भवचक रह गया.

सूर्य बाली, अभय के काफी करीब थे. दोनों की निकटता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वे एक दूसरे को तुम कहके ही संबोधित करते थे. सूर्य बाली ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि “मुझे पता है कि अब तुम्हें अब वापस लाया नहीं जा सकता लेकिन जनजातीय अस्मिताओं और मूल्यों की रक्षा के तुम्हारे संकल्प को आगे हम जरूर बढ़ायेंगे। वादा है कि हम जिम्मेदारी के साथ तुम्हारे कारवां को आगे ले जाएँगे। …अंतिम जोहार के रूप में मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजली !!

काफी दिनों से बीमार चल रहे Abhay Flavian ने 14 मार्च को आखिरी बार अपना फेसबुक अपडेट करते हुए लिखा था.प्रिय मित्रों, पिछले कुछ महीनों से मैं सोशल मीडिया गतिविधियों से अपने आप को रोक रहा हूँ, लेकिन अंत में आप सभी की शुभकामनाओं और अद्भुत जन्मदिन संदेशों का जवाब देने के लिए आया था fb पर भेजें । मुझे याद करने और ऐसे प्रेरक संदेश भेजने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, जो इन चुनौतीपूर्ण समय में बहुत मायने रखता है.

अभय ने मात्र 37 साल में दुनिया से विदाई ले ली.

Ford Foundation की फेलो रही जूही रॉय भी अभय के काम को काफी करीब से जानती हैं. जूही कहती हैं कि अभय संघर्ष के लिए सुख त्यागने की एक मिसाल बन गये थे. इंग्लैंड की शानदार जीवनशैली को त्याग कर छत्तीसगढ़ के दुर्गम चायबागानों के मजदूरों के संघर्ष में कूदना और कौन चाहता. लेकिन अभय ने आदिवासियों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.

जूही ( Juhi Roy) कहती हैं कि अभय खुद को किसानों से आइडिंटिफाई करते थे. मैं उन्हें फैशनेबल फार्मर कहा करती थी.

वह लोग जो अभय से इत्तेफाक नहीं रखते थे उन्हें भी मानना पड़ेगा कि अगर वह होते तो अपने समाज को और भी बहुत कुछ दे सकते थे. लेकिन कुदरत के फैसले के सामने किसका चला है.

 

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