अल्लामा इकबाल की शायरी देशप्रेम, भाईचारा का प्रतीक : मो. आरिफ

अल्लामा इकबाल की शायरी देशप्रेम, भाईचारा का प्रतीक : मो. आरिफ

कौमी तराना सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा के रचयिता अल्लामा मो. इकबाल का 145 वां जन्मदिवस राजकीय उर्दू मध्य विद्यालय, गुलजारबाग, पटना में मनाया।

कौमी तराना सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा के रचयिता, उर्दू और फ़ारसी के विश्व प्रसिद्ध शायर, चिंतक, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, विद्वान सर अल्लामा मोहम्मद इकबाल का 145 वां जन्मदिवस राजकीय उर्दू मध्य विद्यालय सकरी गली, गुलजारबाग, पटना में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

इस मौके पर वर्ग 8 के 50 बच्चों के बीच कौमी तराना लेखन प्रतियोगिता का आयोजन कराया गया। बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली आठवीं की छात्रा नौशीन जमीं को समर फातमा एवं तबस्सुम बिन कामेला व्याख्याता बीएनआर टीचर ट्रेनिंग कॉलेज द्वारा मेडल देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के आयोजन स्कूल के शिक्षक मो. मोअज़्ज़म आरिफ द्वारा किया गया। उन्हें अल्लामा इकबाल के बारे में बताया कि सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा‘, ‘लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी‘ जैसी मशहूर गीतों की रचना इन्होंने की है।अल्लामा इकबाल की शायरी देश प्रेम एवं भाईचारा का प्रतीक है। उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की बेहतरीन शायरी में गिना जाता है।

भारत में अंग्रेजों के द्वारा व्याप्त भ्रष्टाचार, शोषण और अन्य मुश्किलों को लेकर जो जंग चल रही थी उसे और बड़ा बनाने के लिए उन्होंने कहा था –
वतन की
फ़िक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के चर्चे हैं आसमानों में
ना संभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों
तुम्हारी दास्ताँ भी न होगी दास्तानों में।

सारे जहाँ से अच्छा तराना-ए-हिन्दी उर्दू भाषा में लिखी गई देशप्रेम की वह ग़ज़ल है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश राज के विरोध का प्रतीक बनी और जिसे आज भी देश-भक्ति के गीत के रूप में भारत में गाया जाता है। श्री आरिफ अल्लामा इकबाल की जिंदगी पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इनका जन्म 9 नवम्बर 1877 में सियालकोट पंजाब में हुआ था इनके पिता का नाम- शेख नूर मोहम्मद, माता का नाम- इमाम बीवी, पुत्री- मिराज बेगम, पुत्र- आफताब इकबाल, जावेद इकबाल, पत्नियां- करीम बीबी, सरदार बेगम, मुख्तार बेगम थी। इनके प्रसिद्ध पुस्तकें हैं बांग-ए-दरा, बाल-ए-जिब्रील, ज़र्ब-ए-कलीम, जावेद नामा, ज़बूर-ए-अज़म, पयाम-ए-मशरिक़ आदि हैं।

समर फातमा ने स्कूल में अध्ययनरत छात्र छात्राओं को अल्लामा इकबाल का एक शेर मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना सुनाकर बताया कि मज़हब और धर्म कभी भी बैर और दुश्मनी करना नहीं सिखाता है। यह हर व्यक्ति का नीजिगत मामला है। सभी मज़हब दोस्ती, एहतराम, भाईचारा और मोहब्बत करना सिखाता है।

तबस्सुम बिनत कामेला ने हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना – दर्द मंदो से ज़इफो से मोहब्बत करना शेर सुना कर बच्चों को मानव सेवा करने पर बल दिया। इस मौके पर वरीय शिक्षिका रफत आरा फिरोज़, बी०एन०आर० टीचर ट्रेनिंग कॉलेज की प्रशिक्षु उज़मा शाकरीन, निकहत परवीन, मोसर्रत हाशमी, कहकशां हुसैन, आफरीन परवीन, निकहत खातून, पाक़ीज़ा नगमा, एम० अफरोज़ आदि उपस्थित रहे।

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