अरब देशों से संबंध बिगड़ा, तो होगा भारी आर्थिक नुकसान : राजन झा

अरब देशों से संबंध बिगड़ा, तो होगा भारी आर्थिक नुकसान : राजन झा

दिल्ली विवि के प्राध्यापक राजन झा ने कहा कि भाजपा प्रवक्ताओं के कारण न सिर्फ कई देशों से संबंध बिगड़े, बल्कि देश की धर्मनिरेपक्ष छवि को भी धक्का लगा।

प्रो. राजन झा, दिल्ली विवि

भाजपा प्रवकताओं द्वारा पैग़म्बर मुहम्मद के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी के ख़िलाफ़ इस्लामिक देशों और ओआईसी द्वारा कड़ा विरोध प्रकट करना न सिर्फ़ भारतीय विदेश नीति की असफलता है, बल्कि यह भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को भी धक्का पहुँचाता है। जहां तक भारत सरकार द्वारा भाजपा के नेताओं और प्रवकताओं पर क़ानूनी करवाईं करने का प्रश्न है, तो यह राष्ट्रीय हित में है। यह क़ानूनी कार्यवाही इस धारणा को पुष्ट करता है कि “साम्प्रदायिक हित” से कहीं अधिक आर्थिक कारक निर्धारित करते हैं राष्ट्रीय हित को। मालूम हो कि भारत अरब देशों पर कच्चे तेल को लेकर काफ़ी हद तक निर्भर है। इसके अलावा अरब देशों में भारत के लाखों लोग काम करते हैं। इनका भारतीय अर्थव्यवस्था में अच्छा सहयोग रहता है। 

अंतराष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति के निर्धारण में घरेलू राजनीति की अहम भूमिका होती है। इतिहास बतलाता है कि हिटलर की फ़ासीवादी नीतियों ने कैसे जर्मनी को बर्बाद कर दिया। विगत कुछ वर्षों में भारत की राजनीति के केंद्र में हिंदुत्व है। पब्लिक स्फीयर में खुलेआम मुसलमान और इस्लाम के ख़िलाफ़ ज़हर उगला जा रहा। उनके पूजा स्थलों को आए दिन अपमान किया जा रहा। नित्य नए दिन मन्दिर- मस्जिद विवाद खड़े किए जा रहे। कभी मस्जिद में खुदाई के दौरान शिवलिंग मिलने की बात तो कभी क़ुतुब मीनार और ताजमहल जैसे ऐतिहासिक धरोहर को लेकर विवादित बयान दिए जाते हैं। रूलिंग पार्टी के नेताओं के साथ साथ देश के संविधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा भी अमर्यादित बयान से न सिर्फ़ यहाँ के मुसलमान बल्कि बुद्धिजीवी, प्रगतिशील और उदारवादी तबका मायूस और व्यथित है. इसके अलावा विश्व लोकमत भी अंतराष्ट्रीय राजनीति में ख़ासे मायने रखती है। आज वर्ल्ड पब्लिक ओपिनीयन भी भारत में चल रही बहुसंख्यक राजनीति से खुश नहीं है। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का वर्ल्ड ऑर्डर यानी विश्व व्यवस्था एक तरफ़ तो देशों की संप्रभुता को सुनिसचीत करती है तो दूसरी तरफ़  मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर भी बेहद सम्वेदनशील है . अतः भारत को विदेश नीति और राष्ट्रीय हित में अपने घरेलू राजनीति के बहुसंख्यकवाद से डट कर मुक़ाबला करना होगा .

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