बहादुर शाह जफर: भारत को गुलामी से बचाने के लिए अंग्रेजों से 72 जंगें लड़ी

बहादुर शाह जफर: भारत को गुलामी से बचाने के लिए अंग्रेजों से 72 जंगें लड़ी

बहादुर शाह जफर: भारत को गुलामी से बचाने के लिए अंग्रेजों से 72 जंगें लड़ी

 

इतिहास में अंग्रेजों के खिलाफ भारत  के आक्रोश का प्रतीक माने जाने वाले प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व अंतिम मुगल शासक (Bahadur Shah Zafar) बहादुर शाह जफर ने किया.

Bahadur Shah Zafar का जन्म 24 अक्टूबर 1775 में हुआ था उनकी पिता अकबर शाह चौधरी मुगल शासक थे. लालबाई उनकी मां थीं.

 

बहादुर शाह जफर ने आध्यात्मिक व सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के साथ मार्शल आर्ट का भी प्रशिक्षण प्राप्त किया था भारतीय सैनिक जिन्होंने 1857 में मेरठ में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह किया था. 1 मई 1857 को नई दिल्ली के लाल किला पहुंचे  बहादुर शाह जफर ने 12 मई को अपना दरबार लगाया और कई नियुक्तियों की तथा अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा  कर दी.

 

 

तदनंतर उन्होंने बहुत प्रशासनिक विषय परिषद का गठन किया और उसमें विभिन्न धर्मों के लोगों को उनके धर्म के अनुसार नहीं वर्ल्ड उनकी योग्यता व निष्ठा के अनुसार विभिन्न जिम्मेदारियां सौंपी.

 

बहादुर शाह जफर ने हिंदू व मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को आहत किए बिना क्रांतिकारी कदम उठाएं.उन्होंने अपने सैनिकों और भारतीयों से अंग्रेजों को पराजित करने की अपील की. अंग्रेजों की पीछे हटने के बाद बहादुर शाह जफर ने अपने उन सैनिकों को भी बुला लिया जो दिल्ली के बाहर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह कर रहे थे.

 

भारतीय सैनिक दृढ़ संकल्प थे कि दिल्ली उनके साथ से निकल ना जाए किंतु अंग्रेज दिल्ली पर अधिकार करने के लिए निरंतर सड्यंत्र और प्रयत्न कर रहे थे.

 

इस गंभीर परिस्थिति में सितंबर 1857 तक भारतीय सैनिकों और ईस्ट इंडिया के बीच 72 बार भीषण संघर्ष हुआ. आखिरकार 19 सितंबर 1857 में अंग्रेज सैनिकों ने लाल किले में प्रवेश किया और उसे पूर्णरूप से अपने नियंत्रण में ले लिया.

बहादुर शाह जफर को पीछे हटना पड़ा और उन्होंने अपने कुछ परिजनों के साथ हुमायूं के मकबरे में शरण ली जहां से 21 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने जफर को गिरफ्तार किया. अंग्रेजों ने जफर पर मुकदमा चलाया और उन्हें अपराधी घोषित कर 3 दिसंबर 1858 को रंगून जेल भेज दिया. उनके साथ उनकी प्यारी बेगम जीनत महल और 2 पुत्र भी थे. उन्होंने और उनके परिजनों ने 4 वर्ष तक बहुत दयनीय जीवन व्यतीत किया.

 

अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने 7 नवंबर 1862 में अपनी अंतिम सांस ली. वेदना में उन्होंने कहा था जफर तुम कितने बदकिस्मत हो कि तुम्हें अपनी प्यारी मातृभूमि में अपनी कब्र के लिए 2 गज जमीन भी ना मिल सकी.

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