भागलपुर में बलवा:थाने पर धावा बोल दंगाइयों को छुड़ाने का हुआ दुस्साहस,1989 दोहराने की साजिश रोके सरकार

भागलपुर दो दिनों से दंगा झेल रहा है. पुलिस बेबस है. दंगाइयों ने पुलिस पर महला बोला. हद तो तब हो गयी जब दो दंगाइयों को एक खास संगठन के उपद्रवी रविवार सुबह थाना पर धावा बोल कर छुड़ा ले गये. हालात पर काबू ना पाया गया तो 1989 दोहराने की कोशिश हो सकती है.

स्क्रीन सॉट-नौगछिया डाट कॉम

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इर्शादुल हक, एडिटर, नौकरशाही डॉट कॉम

DPillar नामक वेबसाइट ने लिखा है कि  हिंदू संगठनों ने भारी भीड़ जुटाकर रविवार की सुबह थाना का घेराव कर दिया. भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद दो आरोपी दंगाइयों को  हिरासत से जबरन ले गये. इतना ही नहीं एक पुलिसकर्मी की पिटाई भी की गई.

दंगे की शुरुआत शनिवार को हुई. सन्मार्ग के रिपोर्टर ने लिखा है कि आरएसएस के लोगों ने स्थानीय भाजपा नेताओं के नेतृत्व में हिंदू नवर्ष पर जुलूस निकाला. इससे पहले स्थानीय न्यूज पोर्टल naugachia.com ने फेसबुक पेज पर एक विडियो अपलोड किया था. जिसमें पुलिसकर्मियों को दौड़ते हुए दिखाया गया है.

वहीं सन्मार्ग के विडियो में दिख रहा है कि ढोल-नगाड़ों के साथ बाइकों पर निकले युवा काफी उत्साह में चल रहे हैं. ऐसे जुलूस निकालना आम बात है. पर जब यह जुलूस मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरा तो वहां चलते रहने के बजाये रुक कर नारेबाजी शुरू कर दी. काफी देर तक इस इलाके में नारे लगाये जाते रहे. ऐसे में वहां पहुंची पुलिस ने अपना किरदार ठीक से निभाया. पुलिस की कोशिश थी कि जुलूस शांति से निकल जाये. लेकिन पुलिस की एक न चली. स्थानीय लोगों की भी भीड़ जुटती चली गयी. देखते ही देखते हालात बेकाबू होते चले गये. पहले एक दूसरे पर पत्थरबाजी हुई और फिर आगजनी लूटपाट शुरू हुई. पुलिस ने बल प्रयोग करना चाहा तो उस पर हमला बोला गया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार छह पुलिस वाले समेत अनेक लोग घायल हुए. फिर गोलियों की तड़तड़ाहट भी शुरू हुई.

घंटों ऐसे हालात बने रहे. शाम होने पर कुछ महाौल शांत हुआ लेकिन अंदर ही अंदर एक दूसरे के प्रति नफरत बढ़ती गयी. पुलिस पर दबाव बढ़ा कि वह दंगाइयों को अरेस्ट करे. रात होते होते दो दंगाइयों को गिरफ्तार किया गया. लेकिन रविवार सुबह को  DPillar ने अपनी  ग्राउंड रिपोर्ट में लिखा है कि  “तभी आरोपियों के पक्ष वाले हिंदू संगठनों ने भारी भीड़ जुटाकर रविवार की सुबह थाना का घेराव कर दिया. भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद भी दंगा कराने के दोनों आरोपियों को अपने साथ ले गए. एक पुलिसकर्मी की पिटाई भी की गई”.

यह कहना कि इस दौरान पुलिस बेबस थी, कभी उचित नहीं कहा जा सकता. दंगाइयों के साथ सौर्हाद से निपटने की अगर गुंजाइश नहीं थी तो पुलिस को बल प्रयोग करना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. नतीजा यह निकला कि दंगाइयों ने थाने में घुस कर न सिर्फ आरोपियों को छुड़ा ले गये बल्कि पुलिसकर्मी की पिटाई करने का दुस्साहस भी दिखाया.

खबरों में बताया गया है कि  भागलपुर के दंगे को काबू करने के लिए बाहर से पुलिस बल भेजा गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां शांति बने.

पर सवाल यह है कि भागलपुर जैसे संवेदनशील जगह पर, जहां के 1989 के भयावह दंगे दुनिया भर में कुख्यात रहे हों, वहां प्रशासनिक तैयारियां इतनी लुंज-पुंज क्यों थी और पुलिस इतनी नाकार क्यों बनी रही वह दंगाइयों के पत्थरों से जख्मी होती रही पर पुलिस बल असहाय बने रहे.

डीजीपी केएस द्विवेदी की अग्निपरीक्षा

1989 के दंगों को याद करते ही भागलपुर के लोग अभ भी सिहर जाते हैं. एक हजार से ज्यादा मासूमों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा था. हजारों परिवारों को पलायन करना पड़ा था. आज तीन दशक बाद अचानक फिर से भागलपुर के भयावह दंगे जैसी सूरत बनाने का दुस्साहस तो नहीं किया जा रहा?

हाल ही सम्पन्न उपचुनावों के बाद इसी तरह की कोशिश अररिया में की गयी. लेकिन वहां पर हालात नहीं बिगड़े. दरभंगा में भी माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है.

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भागलपुर फिर से दंगों के चपेट में तब आया है जब 1989 में वहां एसपी रहे केएस द्विवेदी राज्य के पुलिस प्रमुख के पद पर आसीन हैं. मिस्टर द्विवेदी के नेतृत्व के लिए भागलपुर का यह दंगा काफी चुनौतियां खड़ा करेगा. यह उनके लिए अग्निपरीक्षा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि मिस्टर द्विवेदी वहां के हालात पर पैनी नजर रखें और वहां शांति बहाल करवाना सुनिश्चित करें.

 

 

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