बिहार कैबिनेट विस्तार : जातियों से ज्यादा 2024-25 चुनावों पर नजर

बिहार कैबिनेट विस्तार : जातियों से ज्यादा 2024-25 चुनावों पर नजर

बिहार में मंत्रियों के शपथ के साथ सबसे ज्यादा चर्चा किस जाति के कितने मंत्री बने इसी पर है। भाजपा भी इसी में उलझी है, पर असली निशाना 2024-25 के चुनाव हैं।

कुमार अनिल

बिहार की राजनीति में रुचि रखनेवाले तमाम लोग किस जाति को कितने मंत्री पद मिले, किस जाति को नहीं मिला, इसी का हिसाब लगाने में व्यस्त हैं। भाजपा सांसद सुशील कुमार मोदी भी इसी में उलझे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को पता है कि उनके सामने असली चुनौती क्या है। जाति तो ठीक है, पर सबसे ज्यादा जरूरी है कि ढाई साल में काम करके दिखाएं, लोगों की उम्मीदों को पूरा करते दिखें, तभी 2024 लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को परास्त करना संभव होगा। इसीलिए जाति तो ठीक है, पर गौर करिए किसे कौन-सा विभाग मिला।

विभागों पर नजर डालिए और देखिए कि जो विभाग किसी सरकार के परफॉरमेंस का पैमाना होते हैं, वो किनके पास है। आम जनता जिन विभागों से सीधा प्रभावित होती है, वो सारे विभाग या तो नीतीश कुमार के जिम्मे हैं या तेजस्वी यादव के पास या सर्वाधिक अनुभवी मंत्रियों के अधीन हैं। ऐसे तो हर विभाग का अपना महत्व है, पर जिन विभागों से किसी सरकार की छवि बनती है, उसका काम दिखता है, वे विभाग हैं-गृह, पथ निर्माण, स्वास्थ्य, ग्रामीण कार्य, ऊर्जा और शिक्षा। कुछ विभाग ऐसे हैं, जिनका सीधा संबंध भले आम जन से न हो, पर सरकार की सेहत के लिए महत्वपूर्ण होते हैं जैसे वित्त, वाणिज्य कर, राजस्व आदि।

अब देखिए पहले की तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास गृह विभाग मतलब कानून-व्यवस्था है। तेजस्वी यादव के पास स्वास्थ्य, पथ निर्माण और ग्रामीण कार्य मतलब ग्रामीण सड़कें और नगर विकास विभाग हैं। बिहार के हेल्थ सिस्टम को ठीक करना कठिन चुनौती है, जिसे तेजस्वी ने अपने लिए रखा है। इसी तरह ऊर्जा विभाग विजेंद्र यादव के पास है। शिक्षा विभाग भी राजद नेता चंद्रशेखर के जिम्मे है।

राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार की छवि और तेजस्वी यादव की बिहार की राजनीति में लंबे समय के लिए पैर जमाने के लिए यह समय चुनौती भी है और अवसर भी। 2025-25 के चुनावों से पहले महागठबंधन सरकार को परफॉर्म करना ही होगा, यही राजनीतिक संदेश विभागों के बंटवारे में दिख रहा है। इसी से वे अगले चुनाव में कह सकेंगे कि काम को चुनिए, जुमले को नहीं।

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