बिहार चुनाव: किसको-कितना डैमेज करेगा ओवैसी-कुशवाहा-मायावती मोर्चा ?

बिहार चुनाव: किसको-कितना डैमेज करेगा ओवैसी-कुशवाहा-मायावती मोर्चा ?

इमेज क्रेडिट – प्रभात खबर

शाहबाज़ की विशेष रिपोर्ट.

बिहार चुनाव से पहले गठित ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट (GDSF) में शामिल 6 राजनीतिक पार्टियाँ भी राज्य की सियासत में अहम् रोल निभाना चाहती हैं लेकिन ऐसा एनडीए या महागठबंधन को वोट छीने बगैर नहीं हो सकता.

GDSF में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, उपेन्द्र कुशवाहा की RLSP, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की BSP और देवेन्द्र प्रसाद यादव की SJDD, ओम प्रकाश राजभर की SBSP और जनतांत्रिक पार्टी शामिल हैं.

बिहार में पहले चरण का मतदान हो चुका है और तमाम राजनीतिक वाद-विवाद एवं विमर्श महागठबंधन और एनडीए में किसकी जीत होगी इसपर केन्द्रित है. लेकिन इस बीच बिहार की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों और अन्य लेकिन महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की आपसी गोलबंदी से बिहार के दो बड़े गठबंधन पर क्या असर होगा इसपर भी विमर्श आवश्यक हो गया है.

बिहार में तीसरे मोर्चे के तहत जो सबसे प्रभावशाली गठबंधन उभरा है जिससे एनडीए और महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगने की बात बड़े प्रमुखता से उठाया जा रहा है वह है ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट (GDSF). इसलिए अब एक नज़र डालते हैं इन पार्टियों के सियासी वोट बैंक और इनसे एनडीए एवं महागठबंधन पर कितना असर होगा ? आखिर में यह भी जानेंगे के GDSF में शामिल पार्टियों से चुनावों के बाद क्या सियासी समीकरण उभरेंगे ?

AIMIM (All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen)

हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की AIMIM का फ़िलहाल बिहार में सिर्फ एक विधायक हैं. AIMIM बिहार के सीमांचल में 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. हाल में असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली नेता के तौर पर उभरे हैं. जिसका असर उनकी चुनावी सभाओं में भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है.

बिहार में मुस्लिम समुदाय की आबादी 16% से अधिक है. राज्य में मुस्लिम समुदाय परंपरागत रूप से राजद और कांग्रेस का समर्थक रहा है. ऐसे में अब ओवैसी सीधे तौर पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस (INC) के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं. जिसका नुक्सान इन दोनों पार्टियों को होगा.

ऐसा इसलिए क्यूंकि मुस्लिम समुदाय ने भागलपुर दंगो के बाद कांग्रेस से दूरी बना ली. वहीँ कुछ मुस्लिम राजद से भी अपनी नाखुशी ज़ाहिर करते हैं. असंतुष्ट मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग पिछले कुछ चुनावों में जदयू के साथ भी था. ऐसे में ओवैसी का असर जदयू के मुस्लिम वोट बैंक पर भी पड़ने का अनुमान है.

RLSP (Rashtriya Lok Samata Party)

RLSP प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा पहले भाजपा के साथ थे एवं केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर भी 2019 लोक सभा चुनाव लड़ा था. फिलहाल बिहार विधान सभा में RLSP के दो विधायक हैं.

कुशवाहा समाज भाजपा एवं जदयू का चुनावों में समर्थन करते रहे हैं. बिहार विधान सभा चुनाव 2020 में RLSP 104 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में उपेन्द्र कुशवाहा को भी उम्मीद है कि वह सफलतापूर्वक भाजपा और जदयू से नाराज़ वोटरों को अपनी तरफ कर लेंगे.

उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी RLSP का औरंगाबाद और कैमूर जैसे जिलों में जनाधार है. पार्टी का वोट शेयर 3.5% के करीब रहा है ऐसे में अगर इसके वोट प्रतिशत में इजाफा होता है तो भाजपा और जदयू का वोट शेयर ज़रूर गिरेगा.

BSP (Bahujan Samaj Party)

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की BSP का पश्चिम बिहार में जनाधार है एवं इसे कुछ दलित वर्गों का समर्थन मिलता रहा है. फरवरी 2005 के बिहार विधान सभा चुनाव में पार्टी ने 6 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था.

बिहार में कुछ दलित वर्ग भी भाजपा को वोट देते रहे हैं. इसबार के बिहार चुनाव में भी अगर ऐसा होता है तो भाजपा को सीधे तौर पर नुक्सान होगा.

SJDD (Samajwadi Janata Dal Democratic)

पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेन्द्र प्रसाद यादव की SJDD का भी बिहार के मधुबनी एवं कुछ अन्य जिलों में जनाधार है. इसको देखते हुए कहा जा सकता है की कुछ सीटों पर यह समाजवादी वर्ग का वोट ले सकती है. चूँकि वह ओवैसी-कुशवाहा के गठबंधन में शामिल है इसलिए इस पार्टी को ओवैसी-कुशवाहा के समर्थक वोटरों का भी समर्थन मिल सकता है.

SBSP (Suheldev Bhartiya Samaj party)

ओम प्रकाश राजभर की SBSP योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री रह चुके हैं. राजभर उत्तर प्रदेश सरकार से अलग होकर बिहार चुनावों में GDSF गठबंधन के साथ आये हैं. SBSP के आलावा ओवैसी-कुशवाहा-मायावती गठबंधन में जनतांत्रिक पार्टी भी शामिल है इसलिए इसे भी GDSF के समर्थकों का वोट मिल सकता है.

फिलहाल बिहार के दोनों बड़े गठबंधन महागठबंधन एवं एनडीए अपने-अपने पक्ष में लहर होने का दावा कर रहे हैं लेकिन अगर बिहार चुनाव के परिणामों के बाद अगर किसी भी पार्टी को स्पष्ट जनादेश नहीं मिलता ह. तब ज़ाहिर है GDSF में भी फूट पड़ने की आशंका है. चूँकि उपेन्द्र कुशवाहा पहले भी NDA के साथ रहे हैं इसलिए वह उस तरफ जा सकते हैं. वहीँ AIMIM राजद और कांग्रेस का समर्थन कर सकती है.

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