बिहार में कामेश्वर चौपाल चर्चा में क्यों हैं ?

बिहार में कामेश्वर चौपाल चर्चा में क्यों हैं ?

इमेज क्रेडिट – The Hindu

प्रोफाइल – शाहबाज़

बिहार में इन दिनों कामेश्वर चौपाल की चर्चा हो रही है. उनका नाम नयी सरकार में उपमुख्यमंत्री पद के लिए लिया जा रहा है. बीजेपी की रणनीति एवं चौपाल की राजनीतिक छवि को उनके नारे “रोटी के साथ राम” से समझा जा सकता है.

वर्ष 1956 में जन्मे कामेश्वर चौपाल (Kameshwar Chaupal) ने जेएन कॉलेज मधुबनी से स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद मिथिला विवि दरभंगा से 1985 में एमए की डिग्री ली। चौपाल के बारे में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं. पहला वह लगातार लोक सभा हो या विधान सभा सभी चुनावों में हारते रहे हैं , दूसरा उनकी पहचान नाम राम मंदिर आन्दोलन से जुड़े शक्श के तौर पर है एवं महत्वाकांक्षा हिंदुत्व के विस्तार की रही है.

कामेश्वर चौपाल बीजेपी के दलित चेहरे भी हैं और उनकी छवि बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं लम्बे समय तक बिहार में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नर्म चेहरे के एवं नीतीश कुमार के अहम्स सहयोगी के तौर पर जाने जाने वाले पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के ठीक विपरीत है.

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कामेश्वर चौपाल लम्बे समय से हिंदुत्व की राजनीति कर रहे हैं. वह राम मंदिर आन्दोलन से भी जुड़े रहे हैं. साल 1989 में उन्होंने राम मंदिर निर्माण के शिलान्यास कार्यक्रम में पहली ईंट रखी थी.

विश्व हिन्दू परिषद् के भूतपूर्व बिहार सह-संगठन मंत्री कामेश्वर चौपाल का उपमुख्यमंत्री पद के लिए आगे होने का एक सन्दर्भ यह भी हो सकता है कि रामविलास पासवान के निधन से बीजेपी को एक बड़े दलित नेता एवं सहयोगी की छति हुई है. बिहार चुनाव के बाद भाजपा पर जदयू द्वारा लोजपा से दूरी बनाने का भी दबाव है ऐसे में पार्टी को चिराग की कमी पाटनी होगी. कामेश्वर चौपाल द्वारा यह कमी दूर हो सकती है.

वहीँ इस बार के चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी के नीतीश के विरोध के बावजूद खराब प्रदर्शन (सिर्फ एक सीट पर विजय) से भाजपा के अन्य संदेह भी दूर हो चुके हैं जिसके कारण बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व लोजपा के साथ पूरे तरीके से सम्बन्ध तोड़ने से सम्बन्ध तोड़ने से रोक रहे थे.

चौपाल का इतिहास भी इस बात का समर्थन करता है. बीजेपी ने उन्हें साल 1991 में रोसड़ा लोक सभा सीट से रामविलास पासवान के खिलाफ चुनाव में उतारा था. हालाँकि वह चुनाव हार गए थे. इसके बाद उन्हें वर्ष 1995 में बेगुसराय विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया गया था, इस बार भी उनकी हार हुई थी. पार्टी की ज़रुरत के अनुसार उन्हें वर्ष 2002 में विधान परिषद् भेजा एवं वह 2014 MLC के तौर पर रहे. 2014 में फिर से पार्टी ने उन्हें सुपौल लोक सभा सीट से उम्मीदवार बनाया लेकिन वह फिर से चुनाव हार गए.

इस बार चौपाल का नाम उपमुख्यमंत्री की रेस में आगे होना, भाजपा के बदलते समय के साथ बदलते रूख को दर्शाता है. हालाँकि उनका नाम ख़बरों में ही आगे है लेकिन इससे यह साफ़ हो जाता है कि बीजेपी बिहार में जेपी आन्दोलन के समय से जुड़े रहे सुशील मोदी द्वारा बनायीं गयी पहचान के बाद अब शायद यह सोच रही है कि समय आ गया है कि अब राज्य में हिंदुत्व के विस्तार की और बढ़ा जाए.

बिहार चुनाव के नतीजों के अनुसार बीजेपी (74 सीटों पर विजयी होकर) दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राज्य में बीजेपी का वोट बैंक एवं कार्यकर्ताओं का अब नर्म रूख वाले नेता से मोहभंग होता दिख रहा है. उन्हें एक ऐसा नेता चाहिए जो बिहार में भाजपा की बढ़ी हुई ताकत को प्रदर्शित भी कर सके और हिंदुत्व के एजेंडा का प्रचार कर कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ा सके.

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