CBI निदेशक आलोक वर्मा को अवकाश पर भेजने की केंद्र सरकार के फैसले पर सुनवाई हुई पूरी 

CBI के निदेशक आलोक वर्मा को उनके अधिकारों से वंचित कर केंद्र सरकार द्वारा अवकाश पर भेजने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली। हालांकि कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला अभी सुरक्षित रखा है, जो बाद में सुनाई जानी है। चीफ जस्टि रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसफ की पीठ ने आज इस मामले में आलोक वर्मा, केंद्र सरकार, केंद्रीय सतर्कता आयोग और अन्य पक्षों की दलीलों को सुना। 

नौकरशाही डेस्क

सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में फैसला बाद में सुनाया जायेगा।सुनवाई के दौरान केंद्रीय सतर्कता आयोग ने दलील दी कि असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी है। सीवीसी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील दी। उन्होंने शीर्ष अदालत के फैसलों और सीबीआई को संचालित करनेवाले कानूनों का जिक्र किया और कहा कि (सीबीआई पर) आयोग की निगरानी के दायरे में इससे जुड़ी आश्चर्यजनक और असाधारण परिस्थितियां भी आती हैं।

इस पर पीठ ने कहा कि अटाॅर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उसे बताया था कि जिन परिस्थितियों में ये हालात पैदा हुए उनकी शुरुआत जुलाई में ही हो गयी थी।नपीठ ने कहा, सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान के हित में होनी चाहिए। वहीं न्यायालय ने जांच ब्यूरो के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना सहित जांच एजेंसी के अनेक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल से कराने के लिए गैर सरकारी संगठन कॉमन काॅज की याचिका पर भी सुनवाई की।

पीठ ने लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राकेश अस्थाना का पक्ष भी सुना। आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे। इन दोनों के बीच लड़ाई तेज होने पर सरकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की सिफारिश पर वर्मा को निदेशक के अधिकारों से वंचित करते हुए अवकाश पर भेज दिया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा नहीं है कि सीबीआई निदेशक और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच झगड़ा रातों-रात सामने आया जिसकी वजह से सरकार को चयन समिति से परामर्श के बगैर ही निदेशक के अधिकार वापस लेने को विवश होना पड़ा हो।प्रधान न्यायाधीश ने सीवीसी से यह भी पूछा कि किस वजह से उन्हें यह कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि यह सब रातों-रात नहीं हुआ। मेहता ने कहा कि सीबीआई के शीर्ष अधिकारी मामलों की जांच करने के बजाय एक-दूसरे के खिलाफ मामलों की तफ्तीश कर रहे थे।बउन्होंने कहा कि सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में जांच करना शामिल है, अन्यथा वह कर्तव्य में लापरवाही की दोषी होगी। अगर उसने कार्रवाई नहीं की होती तो राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय के प्रति वह जवाबदेह होता।

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