ढाई हजार साल पुरानी परंपरा फिर जीवित, बौद्ध विवाह के साथ देशना

ढाई हजार साल पुरानी परंपरा फिर जीवित, बौद्ध विवाह के साथ देशना

बिहार में बौद्ध धर्म के अनुयायी फिर से संगठित हो रहे हैं। पटना में बौद्ध समागम के बाद वैशाली में ढाई हजार साल पुरानी परंपरा को फिर से जीवित किया।

तथागत बुद्ध की कर्मस्थली एवं विश्व प्रसिद्ध वैशाली की धरती के विमल कृति सरोवर के तट पर कल रविवार को बौद्ध विवाह मेला और धम्म देशना समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बहुजन लेखक बुद्ध शरण हंस ने जाति मुक्त विवाह, ग्रामीणों में लघु कुटीर उद्योग, रोजगार को बढ़ावा के साथ बुद्ध की तरह आचरण अपनाने पर जोर दिया। थाईलैंड के भन्ते pc chandra जी ने धम्म देशना दी। बिहार में बुद्ध-अम्बेडकर विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने वाले संतोष बहुजन ने बताया की इस ऐतिहासिक स्थल को विश्व पटल पर लाने के लिए बौद्ध संगठनों को इस स्थल का महत्व को बताएंगे। बिहार एवं भारत सरकार के पुरातत्व विभाग को ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ पत्र के माध्यम से स्थल का महत्व बताएंगे। स्थल के विकास के लिए कमेटी का गठन होगा। आने वाले दिनों में जाति मुक्त विवाह एवं बौद्धिक मेला आयोजित होगा। इंजीनियर सुरेश प्रियदर्शी, राकेश कुमार, प्रभात कुमार बौद्ध भी उपस्थित थेl

उपासिका मुनेश्वरी जी, ग्राम – रसूलपुर तुर्की, भगवानपुर, वैशाली, निवासी, जिनका मायका माकूल वैशाली में ही है, जो विमल कृति सरोवर से कुछ ही दूरी पर अवस्थित है। मुनेश्वरी जी ने उक्त मेले के इतिहास पर चर्चा की। बताया कि आज से करीब 2500 वर्ष पहले तथागत बुद्ध के समय वैशाली के लिच्छवी गणराज्य में वर्तमान विमल कृति सरोवर, बनिया, वैशाली के तट पर वैसाखी पूर्णिमा के दिन विवाह मेला के साथ समारोह में देशना सम्बंधित कार्यक्रम होते थे, जिसमें लोग परिवार सहित भाग लिया करते और देशना सुनने के उपरांत शादी हेतु युवक-युवतियां स्वयं अपने लिए सुयोग्य साथी का चयन किया करते थे। फिर इनके परिवार वाले आपस में मिलकर शादी का दिन निश्चित कर इनका विवाह संपन्न करवाते। तब कोई जाति-धर्म, ऊंच-नीच या किसी तरह का भेद-भाव नहीं था। तथागत बुद्ध इस स्थल पर खुद कई बार देशना दे चुके हैं।

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