Editorial Comment: जब राज्यपाल खुद अपने पद की गरिमा मिट्टी में मिला दे तो ?

Editorial Comment: जब राज्यपाल खुद अपने पद की गरिमा मिट्टी में मिला दे तो ?

 

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इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

ऐसी हालत में संभव है कि हम, तब भी उस पद का सम्मान करेंगे, लेकिन पद पर बैठा व्यक्ति हमारी नजरों में अपना सम्मान खुद ब खुद खो देगा.

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अब जरा जम्मु कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के कल वाले फैसले को लीजिए. उन्होंने ऐन उस वक्त राज्य की विधानसभा को भंग करने का ऐलान कर दिया जब उन्हें इसकी भनक मिल गयी कि महबूबा मुफ्ती की पीडीपी और उमर अब्दुल्लाह की नेशनल कांफ्रेंस कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाने की तैयारी कर रही है.

याद रहे कि पांच महीने पहले पीडीपी की सरकार भाजपा के सहयोग से चल रही थी. अचानक भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया. नतीजे में महबूबा मुफ्ती की सरकार गिर गयी थी. लेकिन इस बीच पिछले दिनों इस बात का इशारा मिलने लगा था कि महबूबा मुफ्ती, अपोजिशन की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के साथ मिल कर सरकार बनाने वाली हैं.

इसी बीच सत्यपाल मलिक ने विधान सभा ही भंग करके लोकतंत्र की हत्या कर दी. यह बात शरद यादव ने कही है. अखिलेश ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दी.

सत्यपाल मलिक मर्यादित पद पर हैं. संघ और भाजपा के संस्कारों में  कैद हैं. उसी संघ भाजपा के संस्कार वाले बिहार के तत्कालीन राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी के इस फैसले की याद उन्हें जरूर होगी जब 27 जुलाई 2017 को उन्होंने नीतीश कुमार को रातोंरात, भाजपा का दामन थाम कर सरकार बनाने की अनुमति महज 12 घंटे में दे दी थी. जबकि नीतीश राजद के साथ मिल कर और भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़े थे.


जब हर तरफ से कल दिन भर मलिक के इस फैसले की कड़ी आलोचना हुई तो उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. पत्रकरों को बताया कि उन्हें जो “उचित लगा वहीं फैसला किया. जिन्हें यह फैसला मंजूर नहीं है तो वे अदालत जा सकते हैं”. उन्होंने अपने फैसले को जायज ठहराते हुए कहा कि “पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस ने एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था. ऐसे में मुझे लगा कि वे दोनों एक साथ मिल कर सरकार क्यों बनायेंगे. यह उचित नहीं था”.

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सत्यपाल मलिक मर्यादित पद पर हैं. संघ और भाजपा के संस्कारों में  कैद हैं. उसी संघ भाजपा के संस्कार वाले बिहार के तत्कालीन राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी के इस फैसले की याद उन्हें जरूर होगी जब 27 जुलाई 2017 को उन्होंने नीतीश कुमार को रातोंरात, भाजपा का दामन थाम कर सरकार बनाने की अनुमति महज 12 घंटे में दे दी थी. जबकि नीतीश राजद के साथ मिल कर और भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़े थे.

सत्यपाल मलिक जो तर्क दे रहे हैं. वह तर्क केसरी नाथ त्रिपाठी के तर्क के एक दम विपरीत है.
सत्यपाल मलिक क्या केसरीनाथ त्रिपाठी के फैसले का अपमान कर रहे हैं? केसरीनाथ का जो फैसला था अगर वह उचित था तो फिर मलिक के फैसले को क्या कहेंगे? केसरी के फैसले के उलट मलिक का जमीर क्यों चला गया?

मलिक को बताना चाहिए कि क्या केसरीनाथ त्रिपाठी ने राज्यपाल पद की गरिमा गिराई या खुद उन्होंने खुद इस पद की इज्जत खाक में मिला दी?

दोनों संघ-भाजपा की कृपा से राज्यपाल पद तक पहुंचे हुए व्यक्ति हैं. उन्हें बताना चाहिए कि देश की जनता किस राज्यपाल को सम्मान की नजरों से देखे और किसके सम्मान पर उंगली उठाये?

क्योंकि एक ही तरह के मुद्दे पर अलग अलग फैसले लेने पर किसी एक का सम्मान तो मिट्टी में मिलता ही है. है न?

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