EXCLUSSIVE: सीतामढ़ी दंगा के मास्टरमाइंड थे ‘नेताजी’,दंगा से पहले बांटी थी शराब

EXCLUSSIVE: सीतामढ़ी दंगा के मास्टरमाइंड थे एक ‘नेताजी’,दंगा से पहले बांटी थी शराब

नौकरशाही डॉट कॉम के इं वेस्टिगेशन में पता चला है कि सीतामढ़ी में दंगा भड़काने के लिए एक सुनियोजित साजिश रची गयी थी और दंगाइयों को उकासने के लिए शराब की सैंकड़ों बोतलें मुफ्त बांटी गयी थीं.

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इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

20 अक्टूबर को भड़के इस दंगे में जैनुल अंसारी नामक एक बुजुर्ग को काट कर जला दिया गया था. इस घटना के दौरान सबीर अंसारी नामक एक बुजुगुर्ग पर जानलेवा हमला किया गया और उन्हें मृत समझ कर फेक दिया गया.

घटना के दस दिनों तक मीडिया में इसकी खबरें प्रमुखता से नहीं आयी. लेकिन नौकरशाही डॉट कॉम ने इस मुद्दे पर लगातार खबरें पहुंचाईं. इस बीच सीतामढ़ी के दंगाग्रस्त इलाके में जा कर हमने इंवेस्टिगेशन की जिसमें कई महत्वपूर्ण और चौंका देने वाले तथ्य सामने आये.

गोशाला चौक पर जहां, जैनुल अंसारी को भीड़ ने पीट कर मार डाला और जला डाला. वहां पर हमारी तहकीकात में सामने आया है कि ऐतिहासिक जानकी मंदिर की जमीन पर बसे मेहतर व पासवान समुदाय के युवाओं को इस दंगे के लिए इस्तेमाल किया गया. यहां के एक युवक ने नाम न बताने की शर्त पर स्वीकार किया कि एक ‘भैया’ के निर्देश पर उन लोगों ने काम किया. यह भैया एक नेता जी हैं जो 2015 विधान सभा चुनाव लड़े थे लेकिन वह हार गये थे. सीतामढ़ी से राजद के प्रत्याशी सुनील कुमार की जीत हुई थी. उसने कहा कि दंगा के बाद भैया ने उस जैसे अनेक युवाओं को जेल जाने से बचाने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने ही दंगा वाली रात आगाह किया था कि पुलिस उन सबके घरों पर छापामारी करने वाली है इसलिए वे लोग फरार हो जायें. इस व्यक्ति ने यह भी कहा कि मूर्ति विसर्जन के दिन( 20 अक्टूबर) को भैया ने बड़े पैमाने पर दारू की बोतलें भेजवाई थीं. इन बोतलों को मूर्ति विसर्जन में शामिल युवाओं ने जम कर पिया था.

गौशाला चौक के आस पास अनुसूचित जाति के काफी घर हैं. इन लोगों में से अनेक लोग शहर के अस्पताल और दीगर सरकारी दफ्तरों में स्वीपर का काम करते हैं. दलित समुदाय में जागरूकता के लिए काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर बताया कि मंदिर परिसर के निकट बसे होने के कारण स्थानीय शक्तिशाली लोगों का प्रभाव इन युवाओं पर है और वे अकसर उनके बहकावे में आ जाते हैं. इस सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि धर्म के नाम पर इन लोगों कें अंदर उन्माद भरने की कोशिश लगातार की जाती है. और यही कारण है कि उनका इस्तेमाल आसानी से दंगा भड़काने में किया गया.

मालूम हो कि गोशाला चौक पर कुछ दुकानें मुसलमानों की भी हैं. जब दो पहर में दंगा भड़का तो गिन गिन कर मुसलमानों की दुकानें लूटी गयीं. उसके पास ही बकरी बाजार है जहां सैकड़ों की संख्या में जानवरों को भी लूट लिया गया. इस बाजार में अधिकतर व्यापारी मुस्लिम हैं.

मजिस्ट्रेट की एफआईआर से खुद पुलिस हुई बेनकाब

इस दंगे और मॉब लिंचिंग के बाद मूर्ति विसर्जन के दौरान नियुक्त पदाधिकारी रमेंद्र कुमार ने एफआईआर दर्ज कराई है. रमेंद्र डुमरा प्रखंड में कार्यरत कार्यक्रम पदाधिकारी हैं और उनके नेतृत्व में पुलिस बल को तैनात किया गया था. रमेंद्र ने एफआईआर में लिखा है कि काली पूजा समिति के  डेढ़ हजार की संख्या में लोग मूतर्ति विसर्जन के लिए गोशाला चौक से मुरलिया चक की तरफ बढ़ने लगे. उनके हाथों में लाठी, तलवार, भाला, फलसा था. वे अल्पसंख्यकों के खिलाफ( मुसलमानों) भड़काऊ नारा लगा रहे थे. हमने उनसे जुलूस ले जाने का लाइसेंस मांगा पर वे लोग उग्र हो गये ( मुरलिया चक की तरफ से जाने का लाइसेंस नहीं था) ये भीड़ बेकाबू होती गयी. इस दौरान हमने पुलिस बल के साथ उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन इस उन्मादी भीड़ ने देखते ही देखते एक दुकान में लूट मचानी शुरू कर दी. वहीं पड़े एक ठेला में आग भी लगा दी. हम भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान अपने वरीय पदाधिकारियों को सूचना दी. वहां और पुलिस बल पहुंचा लेकिन इसी बीच रीगा रोड की तरफ से भी लोग भाला, फालसा के साथ पहुंच गये. इस बीच हमने देखा कि गोशाला चौक के निकट एक अधजली लाश पड़ी थी.

फैक्ट फाइंडिंग टीम ने किया सीतामढ़ी भ्रमण

सीतामढ़ी दंगे पर फै क्ट फाइंडिंग के लिए लोकतांत्रिक जन पहल की एक टीम सामाजिक कार्यक्रता सत्यनारायण मदन और अफजल खान के नेतृत्व में गयी थी. इस टीम में मुकेश कुमार, प्रवीण कुमार भी शामिल थे. इस टीम ने घटनास्थल, प्रभावित लोगों, प्रशासन के अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी मुलाकत की. इस टीम की फैक्टफाइंडिंग रिपोर्ट जल्द ही सार्वजनिक होगी

रमेंद्र कुमार द्वारा दर्ज एफआईआर से साफ है कि जैनुल अंसारी की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गयी थी और पुलिस उपद्रवियों को रोक पाने में असफल रही. लेकिन इसके बाद खुद जिला के डीएम  ने उस लाश को सीतामढ़ी अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बजाये वहां 70 किलोमीटर दूर दूसरे जिले मुजफ्फरपुर मेडिकल कॉलेज में भेजा. इस संबंध में सदर डीएस पी वीर विरेंद्र ने माना कि शव को हम लोगों ने मुजफ्फरपुर भेजा, स्थानीय अस्पताल में नहीं. स्थानीय अस्पताल में भी पोस्टमार्टम किया जा सकता था.

 तमाशा देखती रही पुलिस

EXCLUSSIVE: सीतामढ़ी दंगा के मास्टरमाइंड थे ‘नेताजी’,दंगा से पहले बांटी थी शराब

इस दंगे में पूलिस प्रशासन की भूमिका  पर बड़ा सवाल इसलिए भी खड़ा होता है कि गोशाला चौक पर दंगा भड़कने से एक दिन पहले बस थोड़ी ही दूरी पर स्थित मधुबन गांव में दंगा भड़क उठा था जहां मुसलमानों के घरों में जम कर लूट पाट की गयी थी. पुलिस को मामले की संवेदनशीलता और तनाव के बारे में पहले से ही पता था लेकिन इसके बावजूद गोशाला चौक पर घंटों तांडव होता रहा और पुलिस का अतिरिक्त बल एक से डेढ़ घंटे तक नहीं भेजा गया. इस मामले मे पुलिस अधिकारियों की भूमिका इस लिए भी संदिग्ध लगती है कि जैनुल अंसारी को पहले तलवार और लाठी से मारा गया. उसके बाद लकड़ी इकट्ठा की गयी और उन्हें जला डाला गया. मृतक के परिवार के सदस्य नन्हें अंसारी कहते हैं कि डीएम ने जब लाश के बारे में बतायी तो उन्होंने कहा कि लाश 70 प्रतिशत जल चुकी है. मतल साफ था कि दंगाइयों ने आराम से घंटों वहां खड़े रहे और जैनुल की लाश जलती रही. और इस दौरान पुलिस वहां नहीं पहुंची.

पुलिस की इस लेटलतीफी पर स्थानीय डीएसपी कहते हैं कि हमने मामले पर नियंत्रण के लिए फौरन कोशिश की अगर हमने कोशिश नहीं की होती तो बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क जाती. लेकिन इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि घंटों तक लाश जलती रही लेकिन भीड़ पर काबू पाने या उसे तितर बितर करने के लिए कोई त्वरित प्रयास क्यों नहीं किया गया. इस सवाल पर पुलिस की चुप्पी से ही उसकी भूमिका पर सवाल खड़ा हो जाता है.

 

नवादा दंगा के पैटर्न पर पुलिस ने किया काम, अल्पसंख्यकों पर बोला हमाल

घटना के बाद एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता परवेज ने बताया कि जब गोशाल चौक पर दंगाई हत्या और मारपीट कर रहे थे तो पुलिस वहां पहुंचने के बजाये मुस्लिम बहुल इलाके राजोपट्टी पहुंची. वहां के लोगों को खदेड़ कर मारना शुरू किया. एक दाढ़ी वाले व्यक्ति को मेरी आंखों के सामने पुलिस उसकी दाढ़ी खीच कर पीट रहा था. देखते ही देखते इस महल्ले के दर्जनों लोगों को पकड़ा गया.

परवेज की इस आंखों देखी में पुलिस ने जो पैटर्न अपनाया यही पैटर्न नवादा दंगे के समय भी पुलिस ने अपनाया था. दंगाग्रस्त जगह पर जाने के बजाये पुलिस ने वहां भी मुस्लिम बहुल इलाके में जा कर लोगों पर हमला किया. नवादा में उस समय वही एसपी विकास वर्मन तैनात थे जो अभी सीतामढ़ी में हैं.  विकास वर्मन की नवादा की भूमिका की काफी आलोचना तब हुई थी. लेकिन उन्होंने यही पैटर्न सीतामढ़ी में अपनाया जो उनकी भूमिका पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि दंगा के बाद ज्यादा तर बेगुनाहों को अरेस्ट किया गया है जबकि असल दंगाई अब भी पुलिस की पकड़ में नहीं आये हैं.

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