FATWA पर फैली भ्रांतियां: जानिये क्या है हकीकत

भारतीय समाज में FATWA पर व्यापक स्तर पर भ्रांति फैली हुई है. FATWA से जुड़ी खबरें मीडिया में बड़े पैमाने पर जगह पाती हैं. लेकिन इस संबंध में हकीकत के बजाये भ्रांतियां ही ज्यादा फैलती हैं.

Fatwa myth and reality

फतवा पर फैली भ्रांतियों को दूर करना जरूरी

नौकरशाही मीडिया की प्रस्तुति

समाज के सजग लोगों को फतवे की हकीकत तो जरूर मालूम है पर आम जनमानस में फतवा की असल व्याख्या कुछ उलटी तरह परिभाषित की गयी है. दर असल कुछ लोग FATWA को उलेमा द्वारा दिया गया इस्लामी फरमान समझ लेते हैं. जबकि फतवा  किसी मुद्दे पर मजहबी व्याख्या से ज्यादा कुछ नहीं है. किसी सामाजिक या मजहबी मुद्दे पर इस्लाम और इसके पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब का क्या रवैया है. किसी मुद्दे पर क्या आचरण करना चाहिए. और किस समस्या का क्या समुचित समाधान संभव है. इसे ही फतवा कहते हैं. इसी तरह फतवा देने के लिए अधिकृत व्यक्ति को मुफ्ती कहा जाता है. फतवा शब्द दर असल इफ्ता से बना है.  इस प्रकार फतवा किसी मुद्दे पर दी गयी व्याख्या है जिसे ऐसे विद् वान द् वारा परिभाषित की जाती है जिसने इस्लामी विषयों में मुफ्ती की डिग्री हासिल की हो.

चूंकि आम तौर पर अधिकतर मामलों में  फतवा एक अपील या महज व्याख्या है इसलिए ये बंधनकारी नहीं माने जाते, कुछ अपवादों को छोड़ कर. उदाहरण के तौर पर एक समय में जामा मस्जिद दिल्ली के इमाम अगर किसी खास रानीतिक दल को समर्थन देने का बयान देते हैं तो इसका फतवा से कोई लेना देना नहीं है. यह मजह एक राजनीतिक अपील है. लेकिन कुछ लोग ऐसे बयान को फतवा के रूप में दुष्प्रचारित करते हैं.

FATWA एक इस्लामी व्याख्या 

किसी मजहबी संगठन या दारुल उलूम जैसी संस्थाओं से किसी विषय पर परिस्थिति जन्य व्याख्या को भी फतवा कह के दुष्प्रचारित किया जाता है. उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति किसी मुफ्ती से यह सवाल करता है कि इस्लाम में सूद से आमदनी प्राप्त करना हराम है. ऐसे में किसी बैंकर से अपनी बेटी की शादी करना कितना उचित है. अगर इस विषय पर कोई मुफ्ती( फतवा जारी करने वाला विद्वान) इसकी व्याख्या करता है तो वह इस्लामी नजरिये के लिहाज से ही ऐसा करता है. इसकी साधारण व्याख्या यह है कि इस्लाम में सूद लेना या देना प्रतिबिंधित है, ऐसे में कोशिश यह होनी चाहिए कि सूदखोरी से बचा जाये. लेकिन इस फतवे की व्याख्या का अपवाद यह है कि जिस आर्थिक व्यवस्था में, जहां पूरा बैंकिंग तंत्र इंट्रेस्ट के आधार पर चलता हो, वहां यह संभव ही नहीं कि सूद से बचा जाये. क्योंकि आप अपनी जमा पूंजी को अपने घरों में रख नहीं सकते. उस पूंजी को बैंकिंग तंत्र का हिस्सा बनाना ही होगा. ऐसे में जब आप के सामने कोई विकल्प नहीं नहीं तो आपके पास कोई और रास्ता ही नहीं है. इसे एक और उदाहरण से समझा जा सकता है. इस्लाम में मूर्तिपूजा को प्रतिबंधित किया गया है. इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि हम फोटो खिचवाने को भी इस्लामी उसूलों के खिलाफ समझ लें. आज कल आधार, पहचान पत्र या यहां तक कि हज पर जाने के लिए बनने वाले दस्तावेजों में फोटो के बिना कोई काम ही नहीं चल सकता. ऐसे में मुफ्ती फोटो खिचवाने पर समयानुकूल व्याख्या दें तो यह सिस्टम और समाज के लिए स्वीकार्य होगा. लिहाजा फोटो के सिलसिले में इस्लामी विद्वानों को व्याख्या देते समय उदार रवैया अपनाना चाहिए.

यह भी पढ़ें-  समुदायों के बीच भाईचारे के लिए जरूरी है Interfaith Dialog

 

किसी मजहबी या सामाजिक मुद्दे पर अब दुनिया भर में  परिस्थिति जन्य व्याख्या सामने आने लगी है. यहां तक की सऊदी अरब में भी बड़ी तेजी से परिवर्तन हुए हैं. पिछले दिनों सऊदी सरकार ने महिलाओ को कार चलाने की पाबंदी से आजाद कर दिया. इसी तरह खेल, शिक्षा या सार्वजनिक जगहों पर काम करने संबंधी पुरानी मान्यताओं में तेजी से परिवर्तन आये हैं.

FATWA पर फैली भ्रांतियां

भारतीय समाज में फतवों का राजनीतिक इस्तेमाल काफी हुआ है. इस कारण अब युवाओं में फतवों के प्रति जागरूकता बढ़ी है. शादी, तलाक जैसे गंभीर मुद्दों पर इस्लामी दृष्टिकोण की उदार व्याख्या को युवाओं में प्रचारित करने की जरूरत है. ताकि फतवों की आड़ में इस्लाम और मुस्लिम समाज के प्रति बाकी समाजों में दुष्प्रचािरत करने का अवसर नहीं मिल सके.

फतवों की आड़ में कई बार ऐसा देखा जाता है कि अतिवादी विचारों को पोषित करने वाले उलेमा अपने वर्चस्व और शुद्धतावादी ख्यालों को थोपने का काम करते हैं. वे अपने वर्चस्व के लिए इस्लाम की गलत व्याख्या करके उसे मुसलमानों पर थोपने का प्रयास करते हैं. जबकि पैगम्बर ए इस्लाम के कथन को हदीसों के आईने में देखें तो साफ पता चलता है कि मुहम्मद साहब विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सहअस्तित्व को बढ़ावा देने की बात करते हैं. एक हदीस में मुहम्मद साहब को कोट करते हुए साफ कहा गया है कि वह उन मुसलमानों से काफी नाराज हुआ करते थे जो अपने गैरमुस्लिम पड़ोसियों को किसी तरह की पीड़ा या तकलीफ पहुंचाते थे.

ऐसे में मुसलमानों की युवा पीढी की यह जिम्मेदारी है कि इस्लामी दृष्टिकोण के बुनियादी उसूलों को सकारात्मक रूप से ग्रहण करें और आम लोगों तक प्रसारित करें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*