एक दिन में सवा लाख ट्वायलेट बनाने वाले नीतीश 12 सालों में नहीं कर सके 8 हजार कब्रिस्तानों की घेराबंदी

एक दिन में सवा लाख ट्वायलेट बनाने वाले नीतीश 12 सालों में नहीं कर सके 8 हजार कब्रिस्तानों की घेराबंदी

 

आप को बताते चलें के सदन में विपक्ष के द्वारा क़ब्रिस्तानों की घेराबंदी पर प्रश्न उठाए जाने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानमंडल के मॉनसून सत्र के दौरान विधानसभा में  उत्तर देते हुए कहा कि क़ब्रिस्तानों की घेराबंदी के लिए सरकार ने सर्वेक्षण कराया है, जिसके आधार पर 8064 कब्रिस्तानों की घेराबंदी की जा रही है. उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के अंतर्गत विधायक और विधान पार्षद भी क़ब्रिस्तानों की घेराबंदी करा सकते हैं, लेकिन उस कब्रिस्तान को 8064 की सूची में शामिल होना जरूरी है.

खुर्रम मलिक की खास रिपोर्ट

एक दिन में सवा लाख शौचालय

उन्होंने सदन को बताया कि 75 प्रतिशत कब्रिस्तानों की घेराबंदी कराई जा चुकी है, जबकि अन्य कब्रिस्तानों की घेराबंदी के लिए अधिकारियों को दिशा निर्देश दे दिए गए हैं.

बता दें के बिहार सरकार ने 2006 में सभी क़ब्रिस्तानों की घेराबंदी करने का फैसल किया था, जिस में  8064 क़ब्रिस्तानों की घेरा बंदी करनी थी। लेकिन अब तक घेराबंदी का काम पूरा नहीं हो पाया है। जिसका इकरार नीतीश कुमार ने सदन में ख़ुद किया है। उन्होंने ने कहा के अब तक यह लक्ष्य प्राप्त कर लेना चाहिए था. हालांकि नीतीश कुमार ने इस लक्ष्य को जल्द पूरा करने का आश्वासन तो दिया लेकिन काम में हो रही देरी के कारणों पर कुछ नहीं कहा।

 

ज्ञात रहे के भारत सरकार के अंतर्गत चलने वाले “खुले में शौच मुक्त” नाम से एक अभियान चलाया था जो भारत स्वच्छता अभियान का हिस्सा है। और इस के लक्ष्य को प्राप्त करने का दावा करने वाली नीतीश सरकार का रवैया क़ब्रिस्तान घेरा बंदी के लिए लचर कियू है?

 

अब सवाल यह उठता है के जो सरकार एक दिन में सवा लाख शौचालयों के निर्माण का दावा करती है वही सरकार क़ब्रिस्तान की घेरा बंदी में विफल क्यों है? जब कि इस योजना को लागू किए भी 12 साल से ऊपर हो गए हैं।

 

क्या सरकार की प्राथमिकता में क़ब्रिस्तान कि घेराबंदी शामिल नहीं है?  यह सवाल इसलिए क्योंकि अनेक जिलों में फंड के अभाव में कब्रिस्तानों की घेराबंदी का काम रुका है. कई जगहों पर तो हालत यह है कि दीवार आधी अधूरी ही बन पायी है. कुछ लोग इस मामले में नौकरशाहों को जिम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो यह योजना दो तीन साल में ही पूरी की जा सकती थी.

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