Hasrat Mohani;जिनका नारा ‘इनकलाब जिंदाबाद’जंगे आजादी का प्रतीक है

मौलाना हसरत मोहानी ( Hasrat Mohani) का जन्म जनवरी 1875 को हुआ और उन्होंने अपनी आखिरी सांस एक मई 195 को ली.

Hasrat Mohani
Hasrat Mohani

हसरत मोहानी ( Hasrat Mohani) बएक वक्त अनेक विधा के माहिर थे. वह एक साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी, शायर, पत्रकार, इस्लामी विद्वान, समाजसेवक और आज़ादी के सिपाही थे.


हसरत मोहानी( Hasrat Mohani) का नाम सय्यद फ़ज़ल-उल-हसन था. शायर होने के नाते उनका तख़ल्लुस हसरत था। वह उत्तर प्रदेश के उन्नाव के मोहान में 1875 को पैदा हुए। उनके पिता का नाम सय्यद अज़हर हुसैन था।

हसरत मोहानी ने 1903 में अलीगढ़ से बीए किया। शुरू ही से उन्हें शायरी का शौक़ था. 1903 में अलीगढ़ से एक पत्रिका उर्दूए मुअल्ला का प्रकाशन शुरू किया जो अंग्रेजी सरकार की नीतियों के खिलाफ था. इसी दौरान वह कांग्रेस के करीब होते गये और 1904 में उन्होंने बाजाब्ता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हों गये और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े।

‘इनकलाब जिंदाबाद’ को भगत सिंह और उनके साथियों ने दिल्ली असेंबली में 8 अप्रेल 1929 को एक आवाज़ी बम फोड़ते वक़्त बुलंद किया . यह नारा हसरत मोहानी ने एक जलसे में, आज़ादी-ए-कामिल (पूर्ण आज़ादी) की बात करते हुए दिया था

1905 में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक द्वारा चलाए गए स्वदेशी तहरीकों में भी हिस्सा लिया। 1907 में उन्होंने अपनी पत्रिका में “मिस्र में ब्रितानियों की पालिसी” के नाम से लेख छापी। जो ब्रिटिश सरकार को बहुत खली और हसरत मोहानी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। ।

Begam Hajrat Mahal जिन्होंने अंग्रेजी सेना के खिलाफ फूका था विद्रोह का बिगुल


1919 के खिलाफत आन्दोलन में उन्होंने चढ़ बढ़ कर हिस्सा लिया। 1921 में उन्होंने सर्वप्रथम “इन्कलाब ज़िदांबाद” का नारा अपने कलम से लिखा। इस नारे को बाद में भगतसिंह ने मशहूर किया.उन्होंने कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन (1921) में हिस्सा लिया।

स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों का अतुलनीय योगदान


हसरत मोहानी हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे. श्रीकृष्ण की भक्ति पर उनकी शायरी बेजोड़ मानी जाती है.वह बाल गंगाधर तिलक व भीमराव अम्बेडकर के करीबी दोस्त थे। और जब 1946 में जब भारतीय संविधान सभा का गठन हुआ तो उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य से संविधान सभा का सदस्य चुना गया.


1947 के भारत विभाजन का उन्होंने विरोध किया और हिन्दुस्तान में रहना पसंद किया। 13 मई 1951 को मौलाना साहब का अचानक निधन हो गया।


। 2014 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया है।

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