हिंदी दिवस : हिंदी अखबार ही हिंदी समाज को बना रहे दब्बू, स्वार्थी

हिंदी दिवस : हिंदी अखबार ही बना रहे हिंदी समाज को दब्बू, स्वार्थी

दिनकर, नागार्जुन की कविताएं हिंदी समाज को साहस के साथ सच बोलने, शोषण के खिलाफ प्रतिरोध करने का बल देती हैं। ये ‘हिंदुस्तान’ दिनकर के उल्टा सिखा रहा।

कुमार अनिल

आज हिंदी दिवस है। आज ही हिंदी के बड़े अखबार हिंदुस्तान ने बंगाल में भाजपा द्वारा की गई हिंसा, आगजनी पर जैसी रिपोर्ट की है, उससे राष्ट्रकवि दिनकर और जनकवि नागार्जुन होते, तो सोचिए क्या कहते, क्या करते?

दिनकर और नागार्जुन जैसे न जाने कितने कवियों ने हिंदी समाज को स्वाभिमानी, सच के लिए सत्ता से टकरा जाने का जज्बा दिया। दशकों से हर दमन, उत्पीड़न के खिलाफ, अपने हक के लिए आंदोलन करने वालों में साहस भरा। आज भी साहस दे रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में छोटे-छोटे हिंदी अखबारों ने कितनी शानदार भूमिका निभाई। आज का हिंदुस्तान अखबार क्या कर रहा है? वह हिंदी समाज का मन कैसा बनाना चाहता है? इसे समझने के लिए आज के हिंदुस्तान में प्रकाशित यह खबर देखिए, जिसे तस्वीर के रूप में ऊपर दिया गया है।

कल बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन के दौरान कितना उत्पात मचाया। पुलिस के एक अधिकारी को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। पुलिस की गाड़ी में आग लगा दी। कई वाहनों में तोड़फोड़ की। सोशल मीडिया में इसके वीडियो वायरल हैं। इतनी बड़ी घटना की खबर की हेडलाइन ऐसी बनाई गई है, जिसे देखकर पाठक समझे ही नहीं कि क्या मामला है। नौकरशाही डॉट कॉम ने कई पाठकों के सामने उस पन्ने को रखा, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। पूछने पर लोगों ने कहा कि हेडिंग देखी थी, शायद किसी दुर्घटना के बाद उग्र भीड़ ने आग लगाई हो। खबर के भीतर के बॉक्स को देखिए, तो उसमें भी भाजपा नेताओं के ही पक्ष हैं। हेडिंग के ऊपर जो फ्लैग दिया गया है, उसमें भी सच बोलने का साहस नहीं है। हेडिंग ही नहीं, खबर की दो पंक्ति भी पढ़िए, पता चल जाएगा क्या बताने की कोशिश की जा रही है।

अंग्रेजी अखबार टेलिग्राफ ने इसे विस्तार से छापा है। द टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी शीर्षक में भाजपा लिखा है। अंग्रेजी को भले ही आप विदेशी भाषा कहें, पर उसने साहस दिखाया। लेकिन हिंदी के अखबार ने वह साहस क्यों नहीं दिखाया, शीर्षक को गोलमटोल करके अखबार ने किसकी सेवा की, पाठक को अंधेरे में रखने का क्या मकसद है और कुल मिलाकर हिंदी का यह अखबार हिंदी समाज को कैसा समाज बनाना चाहता है? सोचिए।

शुक्र है कि सोशल मीडिया है। लाखों लोग वीडियो देख रहे हैं। सोशल मीडिया-डिजिटल मीडिया को इसलिए भी धन्यवाद कि वहां सच खड़ा है। सच बोल रहा है, साहस के साथ बोल रहा है।

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