आज़ादी के बाद 19 में से 14 कांग्रेस अध्यक्ष गैर गाँधी परिवार से

शाहबाज़ की कवर स्टोरी

कांग्रेस पार्टी (Indian National Congress) के ऊपर वंशवाद का आरोप लगता रहा है लेकिन आज़ादी के बाद पार्टी के 19 में से 14 अध्यक्ष गाँधी परिवार से नहीं थे।

भारत की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में पूर्णकालिक अध्यक्ष (Full-time President) चुनने को लेकर घमासान मचा हुआ है, हाल ही में पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी ने पार्टी की कमान किसी गाँधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को सौंपने की वकालत की थी। पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी कहा था कि कांग्रेस को एक पूर्णकालिक अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए। जिससे इस बात के संकेत मिलते हैं की पार्टी अब अपनी छवि बदलने की सोच रही है।

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2019 लोकसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। पार्टी के जानकारों का मानना है की अगला अध्यक्ष किसी गैर-गांधी शख्स को बनाया जाए। सोनिया गांधी को पिछले साल अगस्त में पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था। इसके बाद से पार्टी के अंदर अध्यक्ष पद का चुनाव करने की मांग ज़ोर पकड़ रही थी।

कांग्रेस विरोधी दल NDA ( National Democratic Alliance ) एवं उसके सहयोगी कांग्रेस पार्टी पर नेहरू-गाँधी परिवार के अधिपत्य होने का आरोप लगा निशाना साधती रही है लेकिन आज़ादी के बाद से पार्टी के इतिहास को देखे तो कुल 19 कांग्रेस अध्यक्षों में से 14 कांग्रेस अध्यक्ष ऐसे थे जो गाँधी परिवार से नहीं थे। राहुल गाँधी, गाँधी परिवार के पांचवे शख्श है जिन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला. सोनिया गाँधी के नाम सबसे लम्बे समय, 19 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहने का रिकॉर्ड है।

एक नज़र कांग्रेस पार्टी में गाँधी परिवार से बहार के अध्यक्षों पर

1947: जीवात्मा भगवानदास कृपलानी (जेबी कृपलानी)

जब भारत ने 1947 में आज़ादी हासिल की तो कृपलानी कांग्रेस अध्यक्ष थे कांग्रेस के अध्यक्ष थे और नेहरू पहले प्रधानमंत्री बने। हालांकि, बाद में वे नेहरू के आलोचक बन गए और उन्होंने इंदिरा की नीतियों का भी विरोध किया।

1948, 1949: पट्टाभि सीतारमैय्या

कृपलानी के बाद, सीतारमैय्या को पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। उन्हें चुनाव में भाग लेने से परहेज करने के लिए जाना जाता है। अपने कार्यकाल के बाद, सीतारमैय्या ने 1952 से 1957 तक मध्य प्रदेश के राज्यपाल के रूप में भी कार्य किया।

1950: पुरुषोत्तम दास टंडन
पुरुषोत्तम दास टंडन ने 1950 में आचार्य कृपलानी को हराकर कांग्रेस अध्‍यक्ष का पद हासिल किया था। मगर 1951 में इस्‍तीफा दे दिया 1952 में इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीता। अगले साल उन्‍हें गवर्नर बना दिया गया।

1955- 1959 यूएन ढेबर

उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर कांग्रेस के पांचवें अध्‍यक्ष थे। वह एसएसटी आयोग के चेयरमैन भी रहे। बाद में उन्‍होंने राजकोट लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्‍व भी किया। ढेबर ने अमृतसर, इंदौर, गौहाटी और नागपुर में कांग्रेस के वार्षिक सत्रों की अध्यक्षता की।

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1960-1963: नीलम संजीव रेड्डी

रेड्डी पद संभालने वाले सबसे युवा अध्यक्ष थे और लगातार तीन वर्षों तक इस पद पर रहे. बाद में वे भारत के 6 वें राष्ट्रपति भी बने।

1964-1967: के कामराज

कुमारस्वामी कामराज ने कठिन समय में पार्टी की अध्यक्षता की। कामराज ने प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता मंत्री पद से इस्तीफा दें और पार्टी का काम संभाले। इसे ‘कामराज प्लान’ के नाम से जाना जाता था। उनके कार्यकाल के दौरान, नेहरू का भी निधन हो गया और उन्हें नेहरू का उत्तराधिकारी चुनने का काम सौंपा गया। कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री को अगले पीएम बनने में मदद की।

1968, 1969: एस निजलिंगप्पा

निजलिंगप्पा ने इंदिरा की बढ़ती शक्ति के कारण इंदिरा को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। कई राजनीतिक इतिहासकार उन्हें कांग्रेस का विभाजन करने वाला बताते हैं।

1970, 1971: जगजीवन राम

कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद, इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस गुट ने जगजीवन राम को अपना अध्यक्ष चुना। वे 1972 तक अध्यक्ष रहे. लेकिन सत्ता का संतुलन बदला पर वे इंदिरा गांधी के साथ बने रहे।

1972-1974: शंकर दयाल शर्मा

शंकर दयाल शर्मा इंदिरा के करीबी विश्वासपात्र थे। बाद में उन्होंने 1975-77 के दौरान केंद्रीय मंत्रिमंडल में संचार मंत्री के रूप में कार्य किया। वह भारत के नौवें राष्ट्रपति भी बने।

1975-1977: देव कांत बारुहा

इंदिरा गाँधी के आपातकाल के दौरान बरूआ ने कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व किया। वह अपने नारे के लिए प्रसिद्ध हैं – “इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा है” .

1992- 1996: पीवी नरसिम्हा राव

नरसिम्हा राव तब कांग्रेस अध्यक्ष थे जब कोई गांधी परिवार का पार्टी में प्रमुख नहीं था। वीपी सिंह की सरकार के पतन के बाद राव प्रधान मंत्री बने थे और एक समय समय में दोनों पदों पर रहे। उनके विरोधियों ने धीरे-धीरे सोनिया गांधी को राजनीति में आने में मदद की।

1996-1998: सीताराम केसरी

राव के इस्‍तीफा देने के बाद सीताराम केसरी को पार्टी का अध्‍यक्ष बनाया गया। 1997 में उन्‍होंने एचडी देवेगौड़ा की सरकार गिरा दी । फिर आईके गुजराल की सरकार से भी कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। केसरी को कांग्रेस से निकला जाना भारतीय राजनीति की सबसे विवादित घटनाओं में से एक है।

सबसे लम्बे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिआ

सोनिया ने 1998 में पार्टी की कमान संभाली। वह अगले 17 साल तक पार्टी अध्‍यक्ष बनी रहीं। उनके नेतृत्‍व में पार्टी 2004 से 2009 एवं 2009 से 2014 तक सत्‍ता में रही। 2014 में बीजेपी के हाथों करारी हार के बाद राहुल गाँधी को कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व देने की बात ज़ोरो पर थी.

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