NRC से कितना डैमेज होगा हिंदुओं का दलित, पिछड़ा व आदिवासी समाज

  इर्शादुल हक के इस लेख में पढ़िये कि NRC के तहत किस तरह दलित, पिछड़े व आदिवासी नेतृत्व वाली क्षेत्री पार्टियों को मिटाने और इन वर्गों के लोगों को आरक्षण व सम्पत्ति से बेदखल कर उन्हें गुलाम बनाने का ब्रह्मणवादी षड्यंत्र रचा गया है. 

NRC से कितना डैमेज होगा हिंदुओं का दलित, पिछड़ा व आदिवासी समाज

गृहमंत्री अमित शाह को सीना ठोक कर कहने दीजिए कि वह CAA वापस नहीं लेंगे. उन्हें कहने दीजिए

कि पूरे देश में NRC लागू करेंगे. और उनके दल के हजारों कार्यकर्ताओं को घर-घर जा कर समझाने

दीजिए कि NRC से अगर किसी हिंदू की नागरिकता छिन जायेगी तो CAA का कानून इसी लिए बना है

कि उनकी नागरिकता फिर से बहाल हो जायेगी. लेकिन हम तथ्यों और तर्कों से बताना चाहते हैं कि

नया नागिरकता कानून यानी CAA और NRC का मकड़जाल हिंदू समाज के दलितों, पिछड़ों और

आदिवासियों के जीवन को तबाही के दहाने पर धकेल देगा.

 

आइए समझने की कोशिश करते हैं.

असम का उदाहरण

सबसे पहले असम से बात शुरू करते है.असम इसलिए कि सबसे पहले NRC असम में ही लागू हुआ था. एक राजनीतिक षड्यंत्र

के पेशे नजर यह प्रोपगंडा चलाया गया कि वहां पर बांग्लादेशी मुसलमान, लाखों की संख्या में आ घुसे हैं. लेकिन एनआरसी की लिस्ट

बनी तो दुनिया ने देख लिया कि 19 लाख लोगों में से 14 लाख हिंदू ही नागिरकता से वंचित हो गये. यही कारण है कि जब असम मे एनआरसी

के बाद सीएए कानून पास हुआ तो सबसे पहला विरोध असम के हिंदू दलित, पिछड़ों ने ही किया. यह विरोध इतना प्रचंड था कि

वहां कि पुलिस ने गोलियां चलाई और कम से कम 5 हिंदुओं को अपनी जान गंवानी पड़ी. याद रखिए कि असम में विरोध करने वाले

या जान गंवाने वाले मुसलमान नहीं थे.


मुसलमानों के बहाने मूलनिवासी बहुजनों को गुलाम बनाने का षड्यंत्र है NRC

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असम की कहानी को जरा विराम दे कर अब आइए बाकी भारत में NRC और CAA के भयावह परिणाम को समझते हैं. और देखते हैं कि कैसे यह कानून दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के सियासी, समाजिक, शैक्षिक व राजनीतक वजूद को ध्वस्त कर देगा.

 

 एक- SC,ST, OBC के वजूद के लिए खतरा

 

एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन के तहत भारत के हर नागरिक से प्रमाण मांगा जायेगा कि वह साबित

करे कि वह भारत का नागरिक है.इसके लिए उसे कागजी प्रमाण देना होगा. जैसे जमीन पर मालिकाना हक ( 1947 का).

या, यह साबित करना होगा कि देश विभाजन से पहले उसके दादा, नाना, परदादा भारत के नागरिक थे. इसके लिए किसी

सरकारी दस्तावेज से ही साबित करना होगा. इस तरह के प्रमाण जुटाने में देश के अधिकतर लोग नाकाम रहेंगे. चाहे वे हिंदू

हों या मुसलमान.

 

दो- NRC से बाहर होते ही अधिकार समाप्त

भाजपा का भ्रमजाल- भाजपा घर-घर जा कर भ्रम फैला रही है कि अगर आप हिंदू हैं तो CAA कानून के तहत आपको भारत

का नागरिक मान लिया जायेगा. यह सफेद झूठ है. जैसे ही NRC से नाम गायब होगा तो फिर उस हिंदू को भी डाउटफुल नागरिक

बना दिया जायेगा. और डाउटफुल नागरिक को भारत में सम्पत्ति अर्जित करने का कोई अधिकार नहीं है. यानी आपकी तमाम

अचल सम्पत्ति सरकार के कब्जे में चली जायेगी.

 

तीन- आरक्षण के लाभ से वंचित

एनआरसी से नाम गायब होते ही दलित, पिछड़े व आदिवासी को उसके आरक्षण के संवैधानिक अधिकार से वंचित होना

पड़ेगा. क्योंकि दलित पिछड़ों का आरक्षण भारत के नागरिकों के लिए है.अगर आपको सीएए के तहत नागरिकता दे भी

दी जाती है तो आपको यह साबित करना पड़ेगा कि आप दलित, पिछड़े या आदिवासी हैं. ऐसा इसलिए कि अब तक का

जो प्रणा पत्र आपके पास है उसे अमान्य करार दिया जायेगा. क्योंकि अब तक आप अवैध रूप से भारत में रह रहे थे. अगर आपको अफगानिस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश से उत्पीड़न झेल कर आये हुए हिंदू के नाम पर नागिरकता दी जाती है तो आप कैसे साबित करेंगे कि आप हिंदू पिछड़ा वर्ग,दलित या आदिवासी हैं? क्योंकि नया नागरिकता कानून में सिर्फ धर्म का उल्लेख है, जाति का नहीं. ऐसे में नये नागरिकता कानून के तहत आप भारत के नागिरक बन भी गये तो आप आरक्षण से वंचित कर दिये जायेंगे. यानी, शिक्षा, नौकरी और रोजगार में सरकारी आरक्षण जैसे अनेक लाभ आपको तभी मिलेंगे जब आप साबित करेंगे कि ऊपर वर्णित तीन देशों में रहने वाले आपके बाप-दादा पिछड़े या दलित थे.

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सुनो 20 करोड़ मुसलमानो! वादा करो हम NRC में नाम दर्ज नहीं करायेंगे, वे हमें देश से निकाल कर दिखायें

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दूसरी बात यह कि सीएए के तहत आपको नागरिकता मिलने और भारतीय नागरिक होने के तमाम लाभ लेने के लिए वर्षों दौड़-भाग यहां तक कि अदालत का चक्कर भी लगाना पड़ेगा.

 चार; मुसलमान के बहाने दलित, पिछड़े नेतृत्व वाले दलों को मिटाना

आइए अब मुसलमानों की दृष्टि से इसी बात को समझते हैं. NRC से किसी मुसलमान का नाम हट गया तो उसका

क्या परिणाम होगा. इसके राजनीतिक परिणाम सबसे भयावह होंगे. हम बिहार के राजनीतिक स्वरूप को मद्देजनर रख कर देखने

कि कोशिश करते हैं. बिहार में करीब 17 प्रतिशत मुसलमान हैं. NRC के कागजात 80 प्रतिशत मुसलमान नहीं दे पायेंगे. तब

इनकी नागिरकता खत्म हो जायेगी. यानी ये वोट नहीं दे पायेंगे. यानी बिहार के करीब एक करोड़ मुसलमान ऐसे होंगे जिनके

वोट का अधिकार खत्म हो जायेगा. अधिकतर मुसलमान बिहार में राजद, लोजपा, आरएलएसपी के वोटर हैं. इसी तरह उत्तरप्रदेश

में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी के वोटर्स हैं. जबकि झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के वोटर्स है. जैसे ही इन तीन

राज्यों के करोड़ों मुसलमान सपा, बसपा, राजद, रालोसपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा को वोट देने से वंचित हो जायेंगे तो उन पार्टियों

का एक भी प्रत्याशी विधानसभा, लोकसभा में जीत नहीं पायेगा. इसका भयावह परिणाम यह होगा कि लालू, तेजस्वी, चिराग पासवान

अखिलेश यादव, मायवती और हेमंत सोरेन जैसे लोगों की पार्टी ध्वस्त हो जायेगी.इन पार्टियों के नेता न मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक

बनने का सपना अघले सात जन्म तक नहीं देख पायेंगे. मामला साफ है कि मुसलमानों की नागरिकता छीनने का सीधा असर

यह होगा कि बिहार, यूपी, झारखंड में कोई पिछड़ा, दलित या आदिवासी नेतृत्व वाली क्षेत्री पार्टियां मिट जायेंगी. भाजपा

यही चाहती है कि क्षेत्रीय दलों का वजूद मिटा दिया जाये क्योंकि भाजपा के लिए कांग्रेस से ज्यादा खतरा क्षेत्रीय दलों से है.

 

असम से सीखिए

 

अब आइए फिर से असम की बात इसलिए फिर से करना जरूरी है कि असम में जिन संगठनों ने एनआरसी की मांग की थी

उनमें ऑल असम स्टुडेंट्स युनियम सबसे प्रमुख थी. लेकिन जब एनआरसी का फाइनल लिस्ट आया तो उसी के हजारों

समर्थकों का नाम लिस्ट से बाहर हो गया. उसने असम एनआरसी को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि फिर से इसे

सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करेंगे. हजारों भाजपा समर्थकों के नाम भी इस लिस्ट से बाहर हो गया. हालत यह हो गयी कि असम

के भाजपा के नेता भी अब नागिरकता कानून का विरोध कर रहे हैं. आपको याद दिलाना जरूरी है कि असम के आरएसएस

और भाजपा के अनेक नेताओं को भीड़ ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा, उनके घरों पर हमला किया. ऐसा इसलिए भी हुआ कि

नये नागरिकता कानून के तहत बांग्ला भाषियों को नागिरकता मिल जायेगी. वहां भाजपा के खिलाफ इतना भयानक गुस्सा है

कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पिछले डेढ़ महीने में वहां जाने के दो कार्यक्रमों को रद्द कर चुके हैं. उनकी जान पर खतरा है.

 

अब आखिरी सवाल

आखिरी सवाल यह है कि इतना सब कुछ होते हुए भाजपा इस कानून को क्यों लागू करना चाहती है?  तो इसका छोटा सा

जवाब यह है कि वह दलितों, पिछड़ों आदिवासियों और मुसलमानों के तमाम अधिकार छीन कर हजारों वर्ष पुरानी

व्यवस्था लागू करना चाहती है जिसके तहत अगड़े और अमीर वर्ग के लोग यानी ब्रह्मण, राजपूत

 

 

 

 

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