सच्चा धार्मिक व्यक्ति कट्टरता एंव संकीर्णता से मुक्त होता है

सच्चा धार्मिक व्यक्ति कट्टरता एंव संकीर्णता से मुक्त होता है

सच्चा धार्मिक व्यक्ति घृणा, स्वार्थ, कट्टरता और संकीर्णता की भावना से दूर और सौम्य और दयालु होता है जबकि अनैतिक अतिवादी व्यक्ति का मस्तिष्क विघटनकारी और दुविधापूर्ण होता है.

हालांकि बाहर से वह सिद्धांत सूत्र, धर्म सिद्धांत योजनाएं बनाता है. हालांकि वह बाहर से विश्वास अथवा इसके महत्व का आडंबर प्रदर्शित करता है. अपने वैज्ञानिक अथवा धार्मिक मत की विशेतज्ञता पर अधिक बल देता है.
वास्तव में मस्तिष्क मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है जिस की असाधारण महत्वाकांक्षा  है. और वह लगातार प्रश्न करता है झिझकता है इसलिए समाज और मानवता के लिए प्राकृतिक विचारों और रचनात्मक योगदानों की सृजनता को रोकता है. इसके अलावा धार्मिक विचार वाला मन विचारों के मूल में जा सकता है और इसकी खोज करने के बाद सच की खोज करता है.
वास्तव में मस्तिष्क मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है जिस की असाधारण महत्वाकांक्षा  है. और वह लगातार प्रश्न करता है झिझकता है इसलिए समाज और मानवता के लिए प्राकृतिक विचारों और रचनात्मक योगदानों की सृजनता को रोकता है. इसके अलावा धार्मिक विचार वाला मन विचारों के मूल में जा सकता है और इसकी खोज करने के बाद सच की खोज करता है.
इसके अलावा मुक्त महत्वकांक्षी और दयालु भी होने लगता है. वह पूर्व की कठोरता परंपरा, रीति और अनुष्ठानों से सजाने की कोशिश करता है. इसलिए अतिवाद अथवा निराशविवाद आदर्शों को रोकता है.
 
गलत संगति से मुक्त ऐसा मन-मस्तिक निर्धारण करने के लिए विचारों पर बने रहना जानकारी एकत्र करना, अनुभव और उसके बाद व्यक्तिगत और संकलित प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करना चाहिए. किसी समय यदि मस्तिष्क उलट पलट जाये तो विचार मंथन से समाधान करना चाहिए  और एक अपने ही अंदर किसी वाक्य उपदेश, विश्वास के विश्लेषण और समकालीन समाज के अलावा वर्तमान के साथ पूर्व के सामंजस्य के माध्यम से उन्मूलन करना चाहिए.
संक्षेप में अतिवाद विभाजन के प्रतिरोध के लिए सार्वभौमिक प्रेम मानवता और सद्भावना सहित स्वस्थ मानसिक आदर्श को फैलाने की आवश्यकता है. जो तथापि सच्चे धार्मिक मन मस्तिष्क व्यक्ति में पहले से ही निहित होते हैं.

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