जब सत्ता भीतर से डरी हो, तो दमन का सहारा लेती है

जब सत्ता भीतर से डरी हो, तो दमन का सहारा लेती है

आज बेरोजगारी-महंगाई के खिलाफ युवा राजद के प्रदर्शन पर नीतीश सरकार ने जम कर लाठियां बरसाईं। यह सत्ता की मजबूती है या कमजोरी की निशानी है।

कुमार अनिल

आज युवा राजद के प्रदर्शन पर पुलिस ने जमकर लाठियां चलाईं। कई कार्यकर्ता घायल हुए। खुद तेजस्वी यादव पर पत्थर फेंके गए। सरकार के इस दमन को किस प्रकार देखा जाना चाहिए?

किसी बंद या विरोध प्रदर्शन के प्रति पुलिस- प्रशासन का रुख राजनीतिक निर्णय होता है। कभी पुलिस प्रदर्शनकारियों को गांधी मौदान पहुंचने ही नहीं देगी, कभी प्रदर्शन को बीच में रोक देगी या कभी किसी बंद में उग्र प्रदर्शनकारियों के बावजूद पुलिस नरम बनी रहती है। प्रशासन का यह रुख सरकार के राजनीतिक रुख पर निर्भर करता है।

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बिहार में नई सरकार के गठन के सिर्फ चार महीने ही हुए हैं। आमतौर से नई सरकार के गठन के एक साल बाद तक कोई बड़ा आंदोलन नहीं होता और सरकार का रुख भी नरम होता है। उसे नया-नया जनादेश मिला होता है। इस बार दोनों मामलों में परिवर्तन दिख रहा है। नई सरकार के गठन के सिर्फ दो महीने बाद ही अपराध बड़ा मुद्दा बन गया। सवाल पूछने पर खुद सीएम झुंझलाते दिखे। अब सरकार सिर्फ चार महीने बाद ही इस तरह दमन का सहारा ले रही है।

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नीतीश सरकार का दमनात्मक रवैया दरअसल उसकी मजबूती नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है। 19 लाख रोजगार देने का वादा करके सरकार सत्ता में आई है, लेकिन वह रोजगार पर बात करने के बजाय हरियाली पर बात कर रही है। सरकार को भय है कि रोजगार कहीं बड़े आंदोलन का रूप न ले ले। इसीलिए वह दमन का सहारा ले रही है। हर सरकार यही समझती है कि दमन से वह विरोध की आवाज को दबा देगी, लेकिन हर सरकार आज तक गलत साबित होती रही है।

राज्य की वर्तमान नीतीश सरकार जनता के मुद्दों पर घिरी हुई है, चाहे वह रोजगार हो, पढ़ाई हो, दवाई हो। इसके साथ ही जदयू और भाजपा में अघोषित प्रतिद्वंद्विता जारी है। इस तरह राज्य सरकार भीतर और बाहर दोनों तरफ से फंसी हुई है। डरी हुई है। असुरक्षा के भाव से घिरी है।

अब देखना है तेजस्वी यादव किस प्रकार बेरोजगारी के मुद्दे को आगे बढ़ाते हैं और इसे बड़े राजनीतिक आंदोलन में तब्दील करते हैं। आज नहीं तो कल, वे सरकार गद्दी छोड़ो का नारा देंगे, देखना है, उस दिन को वे किस प्रकार करीब खींच लाते हैं।

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