जनगणना में आदिवासियों को अलग धर्म स्वीकारने की उठी मांग

जनगणना में आदिवासियों को अलग धर्म स्वीकारने की उठी मांग

जनगणना का अर्थ ही है विविधता को दर्ज करना। जातीय जनगणना की मांग हो रही है। इस बीच आदिवासियों के अलग धर्म को जनगणना में दर्ज करने की उठी मांग।

पिछले साल नवंबर में झारखंड विधानसभा ने सरना आदिवासी धर्मकोड बिल पारित किया था। अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने रवि कुमार मीणा के एक ट्वीट को रिट्वीट किया, जिसमें जनगणना में आदिवासियों के अलग धर्म को स्वीकृति देने की मांग की गई है। मीणा ने #आदिवासी_धर्म_कॉलम_बनाओ के साथ ट्वीट किया- झारखंड की @HemantSorenJMM सरकार ने 2021 की जनगणना में अपने आदिवासी समाज के हितो को ध्यान में रखते हुए सदन से सरना आदिवासी धर्म कोड बिल को पास कराकर केंद्र सरकार को भेजा है परन्तु इस मुद्दे पर मोदी सरकार खामोश है। BJP में शामिल आदिवासी नेता भी चुप है।

हम वनवासी नहीं, आदिवासी हैं

आदिवासी हितों के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय हंसराज मीणा ने कल उसी हैशटैग के साथ ट्वीट किया था- यह हमारा कर्तव्य है कि हम सब मिलकर जनगणना-2021 में आदिवासी धर्म का अलग कॉलम बनाने की मांग करें। हम वनवासी नहीं, आदिवासी हैं। हम भारत के मूल निवासी हैं। इसीलिए आदिवासियों के धर्म का अलग खाना बनाना होगा। राजेंद्र चौहान बाघ ने भी कहा कि हम वनवासी नहीं, आदिवासी हैं।

मोनिका मेदा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की उस खबर को शेयर किया है, जिसमें सोरेन ने कहा है कि आदिवासी अलग धर्म है। वे हिंदू नहीं हैं। ऐसे ही अनेक आदिवासी एक्टिविस्ट ने ट्वीट किया है कि उनका धर्म अलग है। उन्हें अलग धर्म के रूप में स्वीकृत किया जाए। इसके लिए जनगणना में अलग श्रेणी बनाई जाए।

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आदिवासी बिंदास बामणिया ने कहा हमारी पहचान को बनाए रखने के लिए आदिवासियों क अलग से धर्म कॉलम की केंद्र सरकार से मांग करता हूं ताकि हम हमारी बोली भाषा संस्कृति और हमारे पूर्वजों द्वारा दी गई विरासत को बचा सके।भारत मे 1871-1941 तक हुई जनगणना में आदिवासियो को अन्य धर्मों से अलग धर्म मे गिना गया 1951 की जनगणना के बाद आदिवासीयो को हिन्दू धर्म में गिना गया।

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