कठिन दौर में स्वागतयोग्य है तेजस्वी आपका यह कदम

कठिन दौर में स्वागतयोग्य है तेजस्वी आपका यह कदम

एक दौर था जब दूसरी जाति या धर्म में शादी करना तालाब में कंकड़ फेंकना भर था, लेकिन आज यह तूफान के खिलाफ खड़ा होना है। इसलिए तेजस्वी के कदम का स्वागत करिए।

तेजस्वी-रशेल

कुमार अनिल

बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने ईसाई लड़की से विवाह क्या किया, कई लोग परेशान हैं। और तो और, खुद राजद भी कुछ समय के लिए असहज लग रहा था, हाल यह था कि किसी को तेजस्वी की होनेवाली दुल्हन का नाम तक पता नहीं था। मीडिया में कई नाम आते रहे। विवाह के बाद राजद ने दो-चार नेताओं के बधाई संदेश को रिट्वीट किया, लेकिन किसी में दुल्हन का नाम नहीं है। कायदे से विवाह की बधाई दूल्हे और दुल्हन दोनों को दी जानी चाहिए। राजद से नहीं, मीडिया से लोग दुल्हन का नाम जान पाए-रशेल।

आज का दौर बेहद कठिन है। जब पहनावे, खान-पान, दाढ़ी-टोपी पर समाज में जहर फैलाने, हिंसा करने वाले लोग सक्रिय हों, तब तेजस्वी का ईसाई लड़की से विवाह साहसिक कदम है। गुरुग्राम में नमाज बाधित करने के लिए शोर मचाया जा रहा है, धर्म परिवर्तन का आरोप लगाकर कर्नाटक से उत्तराखंड तक चर्च पर हमले किए जा रहे हैं, तब ईसाई लड़की से विवाह साहसिक कदम है। जब दिन-रात सोनिया गांधी के ईसाई साबित करने, विदेशी साबित करने में एक जमात लगी हो, तब तेजस्वी का यह फैसला सहस भरा है।

दूसरे धर्म या दूसरी जाति में विवाह पर हमारा समाज पहले भी संकीर्ण रहा है, लेकिन मामला दो परिवारों, दो गांवों तक सीमित रहता था। इसलिए तब जाति-धर्म का बंधन तोड़ना ठहरे हुए समाज के तालाब में कंकड़ फेंकने जैसा ही था, लेकिन आज यह नफरत की आंधी के खिलाफ खड़ा होना है।

बिहार में जाति तोड़ो आंदोलन चला है। कभी जनेऊ आंदोलन चला, तो बाद में जनेऊ तोड़ो आंदोलन भी चला। कैथोलिक परिवार में जन्म लेनेवाले जॉर्ज फर्नांडिस की कर्मभूमि बिहार रही। खुद तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद के साथ वे एक ही समाजवादी धारा के आंदोलन में रहे। जॉर्ज दशकों तक बिहार से सांसद होते रहे।

हां, यह सही है कि तब कांग्रेसी जमाना था और जाति-धर्म के नाम पर इतना विष नहीं फैलाया गया था। तब सवाल है कि क्या बिहार आगे जाएगा या विष फैलानेवालों से डर कर पीछे जाएगा। अगर आगे जाना है, तो युवाओं को ही उदाहरण पेश करना होगा। और तेजस्वी ने आगे बढ़कर उदाहरण पेश किया है।

बिहार के समाजवादी आंदोलन में विचारधारात्मक संघर्ष का पहलू अहम और शानदार रहा है। नए दौर में वह शिथिल हुआ है, जिसे तेजस्वी ने फिर से जिंदा किया है।

उसने गांधी को क्यों मारा जैसी चर्चित और जरूरी पुस्तक के लेखक अशोक कुमार पांडेय का आज का ट्वीट यहां बेहद प्रासांगिक है। उन्होंने कहा-सच कहूं तो इस समय लड़ाई राजनैतिक नहीं, विचारधारात्मक़ है। एक तरफ़ है साम्प्रदायिक विचारधारा, जो संविधान को नष्ट कर एक तानाशाही स्थापित करना चाहती है, दूसरी तरह संविधान और लोकतंत्र की पक्षधर विचारधारा। ऐसे समय में निष्पक्ष रहना सिर्फ़ बौद्धिक अय्याशी हो सकती है। पक्ष चुनो।

और तेजस्वी ने सही पक्ष चुना है। नौकरशाही डॉट कॉम स्वागत करता है, आप भी करिए।

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