ललन सिंह की असली परीक्षा आगे है, ये हैं दो सवाल

ललन सिंह की असली परीक्षा आगे है, ये हैं दो सवाल

नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल और जदयू को राष्ट्रीय पार्टी बनाने का प्रस्ताव पास करना आसान है, पर इसे जमीन पर उतारने के लिए ये हैं दो बड़े सवाल।

कुमार अनिल

जदयू के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह के नेतृत्व में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने नौ प्रस्ताव पारित किए। इनमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल बताना और पार्टी को राष्ट्रीय दल बनाना शामिल है। लेकिन इन प्रस्तावों को जमीन पर उतारने के लिए भी क्या ललन सिंह तैयार हैं?

दो बड़े सवाल हैं और इन दोनों पर जदयू अबतक चुप है। इन दो सवालों के सही उत्तर के बिना जदयू के राष्ट्रीय पार्टी बनने की बात तो दूर उसे बिहार में भी अपने जनाधार को बचाना आसान न होगा।

कल नौकरशाही डॉट कॉम ने एक दुकान पर तीन लोगों को चर्चा करते सुना। तीनों अपनी बीवियों से इस बात के लिए नाराज थे कि वे रसोई गैस ज्यादा खर्च करती हैं। आज बिहार के किसी मोड़ पर चले जाइए, महंगाई से परेशान लोग मिल जाएंगे। लोग प्रधानमंत्री मोदी से नाराज हैं। कुछ दिनों पहले तक पेट्रोल महंगा होने का समर्थन करनेवाले लोग भी अब मोदी के खिलाफ हो गए हैं। पेट्रोल, सरसों तेल ही नहीं, जैसे हर चीज में आग लगी है। सवाल है कि क्या महंगाई के खिलाफ बढ़ रहे गुस्से का नुकसान जदयू को नहीं होगा?

आज तक महंगाई पर जदयू चुप है, जबकि यह देश का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। महंगाई के लिए केंद्र सरकार की नीतियां दोषी हैं। गैस छोड़कर बिहार में गरीब फिर से लकड़ी के चूल्हे पर आ गया है। सिर्फ पांच किलो अनाज देने से न लोगों के जीवन में खुशहाली आएगी न ही गुस्सा कम होगा। लोगों का कहना है कि पांच किलो अनाज ने गरीबों को भिखमंगा बना दिया है। लोग स्वाभिमान के साथ कमाना चाहते हैं। नीतीश को पीएम मैटेरियल साबित करने के लिए, पार्टी का राष्ट्रव्यापी विस्तार करने के लिए जरूरी है कि पार्टी महंगाई पर चुप्पी तोड़े और लोगों के गुस्से को स्वर दे। क्या जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंगाई पर लोगों के साथ खड़े होंगे?

दूसरा बड़ा सवाल है फेक खबरों और वाट्सएप यूनिवर्सिटी के कारण लोगों के दिमाग का सांप्रदायिक नफरत से विषाक्त हो जाना। जिस दुकान पर तीन लोग महंगाई को लेकर मोदी सरकार से सख्त नाराज थे, थोड़ी देर बाद ही वे देश के बंटवारे के लिए गांधी और नेहरू को अपशब्द कह रहे थे। गोडसे को देशभक्त कह रहे थे। वे एक संप्रदाय विशेष को जनसंख्या वृद्धि के लिए जिम्मेदार बता रहे थे। वे धार्मिक घृणा से भरे थे। यह जो सांप्रदायिक नफरत फैलाई गई है, क्या जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस पर कुछ बोलेंगे?

आए दिन किसी मुस्लिम फुटपाथ दुकानदार को पीट दिया जाता है, जबरन जयश्रीराम के नारे लगवाए जाते हैं। आज ही सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यूज को कम्युनल कलर देना देश की छवि खराब करना है। सुप्रीम कोर्ट सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ कई बार बोल चुका है, लेकिन जदयू कब बोलेगा?

जदयू के पूर्व विधायक और ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के प्रवक्ता रमेश कुशवाहा ने नौकरशाही डॉट कॉम को बताया कि जो अतिपिछड़ा कल तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ था, आज उसका बड़ा हिस्सा वैचारिक रूप से सांप्रदायिक तत्वों के साथ खड़ा है। वह धार्मिक उन्माद के प्रचार का शिकार हो गया है। कहने को वह जदयू में है, लेकिन विचार से वह भाजपा और संघ के साथ है। रमेश कुशवाहा की बातों का अर्थ है कि उसे धार्मिक नफरत से बाहर लाना और फिर से समाज में गांधी, नेहरू, आंबेडकर के विचारों को स्थापित किए बगैर जदयू अपना आधार नहीं बचा सकता।

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यह ठीक है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ों को पंचायतों में अधिकार दिया, नौकरियों में अवसर दिए, महिलाओं को आरक्षण दिया, लेकिन देश और समाज में जो बदलाव आए हैं, जो नए सवाल उठ खड़े हुए हैं, उससे बचते हुए राष्ट्रीय पार्टी बनने का कोई रास्ता नहीं निकलता। नीतीश कुमार में पीएम मैटेरियल होने की बात को भी साबित करने के लिए सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ लोगों को एकजुट करना होगा। ऐसा किए बगैर आगे बढ़ने की बात छोड़ दीजिए, जदयू को अपना जनाधार बचाना भी कठिन होगा। क्या ललन सिंह कहेंगे कि ‘हम टीका भी लगाएंगे और टोपी भी पहनेंगे’?

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