शांति और भाईचारे के पैगम्बर मोहम्मद ने ताकत के बेजा इस्तेमाल व आक्रामकता को नकारा

पैगम्बर मोहम्मद साहब ईमानदारी, सच्चाई और मानवता के अलमबरदार थे. वह पड़ोसियों के साथ अच्छे सुलूक के हामी थी.कमजोरों पर रहम करते थे. जरूरतमंदों के लिए हर समय मददगार रहते थे. ऐसा करते हुए वह मुस्लिम या गैरमुस्लिम के भेद को कत्तई नहीं मानते थे.

वह किसी पर भी अपनी विचारधारा थोपने के खिलाफ थे.

पैगम्बर मोहम्मद साहब ने फरमाया कि  वह शख्स ईमान वाला नहीं जो अपना पेट भर ले और उसका पड़ोसी भूखा रहे.

अल्लाह के पैगम्बर के रूप में मोहम्मद सलल्लाहो अलैहे सल्लम एक बेहतरीन मॉडल हैं.

अल्लाह ने कुरआन में पैगम्बर मोहम्मद साहब की शख्सियत बयान करते हुए कहा है कि आप उनके लिए, जो अल्लाह पर सारी उम्मीदें रखते हैं और आखिरत पर ईमान रखते हैं, उन सब के परफेक्ट दूत हैं ( सुरह अल एहजाब).

 

अल्लाह ने हजरत आदम से कहा कि  अगर मोहम्मद की तख्लीक नहीं हुई होती तो  तुम्हारी भी तख्लीक नहीं की जाती.

उन्होंने एक रहबर, एक पिता, एक पति, रिश्तेदार, दोस्त के रूप में काफी महत्वपूर्ण और संतुलित किरदार निभाया. यहां तक कि उन्होंने अपने शत्रुओं के साथ भी काफी धैर्य , रहमदिली और दयापूर्ण व्यवहार किया. ऐसे में हर मुस्लिम पर यह फर्ज है कि वह भी मोहम्मद साहब के सुन्नत पर अमल कर.

मोहम्मद साहब ने जब यह जान लिया कि मक्का में उनका रहना पूरे समाज की शांति के लिए उचित नहीं तो उन्होंने मदीना हिजरत करने का फैसला कर लिया और वह, वहां 20 वर्षों के बाद तब लौट जब उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया कि अब उनका लौटना शांति के लिए किसी भी तरह खतरा नहीं.

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पैगम्बर साहब ने मदीना में शांति और भाईचारे की स्थापना की. इतना ही नहीं उन्होंने वहां अपने दुश्मनों से भी मुर्रवत का व्यवहार किया.

उनके लिए सबके साथ न्याय का मतलब था कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक यानी हर तरह के इंसाफ की स्थापना करना. इस तरह से मोहम्मद साहब ने इस्लाम को शांति, दया, इंसाफ और भाईचारे के मजहब के रूप में स्थापित किया.

इस्लाम धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद का पोषक है

दुनिया तभी जन्नत की तरह बन सकती है जब  मुस्लिम और गैरमुस्लिम सभी हजरत मोहम्मद के रास्ते पर चलें.

पैगम्बर मोहम्म कहते हैं कि “अगर तुम अल्लाह से प्यार करते हो तो मेरे रास्ते पर चलो तो अल्लाह तुम्हें भी प्यार करेगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ कर देगा”.

 

 

 

 

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