नीतीश जेपी की राह पर या वीपी की, शरद पवार और दीपंकर से मिले

नीतीश जेपी की राह पर या वीपी की, शरद पवार और दीपंकर से मिले

नीतीश कुमार बुधवार को एनसीपी नेता शरद पवार और माले नेता दीपंकर भट्टाचार्य से मिले। राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा कि नीतीश जेपी की राह पर बढ़ रहे या वीपी की!

कुमार अनिल

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तीन दिनों से दिल्ली में हैं। आज उन्होंने एनसीपी प्रमुख शरद पवार और भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य से मुलाकात की। पत्रकारों ने पहले की तरह विपक्ष के एजेंडे पर सवाल नहीं किया, बल्कि भाजपा के एजेंडे पर सवाल पूछे। यह नहीं पूछा कि महंगाई, बेरोजगारी और अघोषित आपातकाल पर क्या विचार है, बल्कि वही सवाल दुहराया कि आप प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं या नहीं, विपक्ष का नेता कौन होगा आदि। नीतीश कुमार ने वही जवाब दिया कि वे न तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और न ही प्रधानमंत्री बनने की कोई इच्छा है। इसी के साथ राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि नीतीश जेपी की राह बढ़ रहे हैं या वीपी सिंह की राह पर चल रहे हैं।

मालूम हो कि 1977 में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने कांग्रेस के खिलाफ सारे दलों को एकजुट किया था, जिसके बाद जनता पार्टी बनी थी। जनता पार्टी को लोकसभी चुनाव में बहुमत मिला था और विपक्ष की सरकार बनी थी। वहीं वीपी सिंह ने 1987 में कांग्रेस से अलग होकर बोफोर्स घोटाले का मुद्दा उठाते हुए विपक्ष को एकजुट किया था। बाद में वे एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ वाम के समर्थन से प्रधानमंत्री बने थे। फिर भाजपा ने राम मंदिर का मुद्दा उठाया तो वीपी सिंह ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण को लेकर बने मंडल कमीशन की शिफारिशों को लागू किया था। लोग चर्चा कर रहे हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जेपी की तरह खुद सत्ता से दूर रहते हुए मोदी सरकार को हटा कर विपक्ष की सरकार बनाएंगे या वीपी सिंह की तरह विपक्ष को एकजुट करते हुए खुद प्रधानमंत्री बनेंगे।

राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा की बात को छोड़ दीजिए, तो नीतीश कुमार की दिल्ली यात्रा कामयाब रही, इसमें किसी को शक नहीं है। अब उनका अगला कदम क्या होगा, सबकी नजर इस बात पर है। क्या नीतीश कुमार कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम आगे बढ़ाएंगे या हर राज्य में प्रमुख भाजपा विरोधी दल को ताकत पहुंचाते हुए पहले भाजपा को दिल्ली की सत्ता से बाहर करने की रणनीति बनाएंगे। और फिर चुनाव के बाद विभिन्न दलों का गठजोड़ करते हुए प्रधानमंत्री चुनने की राय देंगे, जैसा कि 90 के दशक में प्रयोग हो चुका है। सब चुन कर जब दिल्ली पहुंचे, तो विपक्षी संयुक्त मोर्चा बनी और सरकार भी।

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