Surgical Strike:कितने बेबस और लाचार हो गये हैं नीतीश

Surgical Strike: कितने बेबस और लाचार हो गये हैं नीतीश

Irshadul Haque

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

मैंने रिटार्ड हो चुके शिक्षक से पालीगंज की सभा के दौरान पूछा-  क्या ये वही नीतीश कुमार है, 2009 वाले? न, कत्तई नहीं. रिटायर्ड शिक्षक ने टका सा जवाब दिया.

उस बुजुर्ग ने आगे कहा- यह जो नीतीश कुमार मंच पर दिख रहे हैं, नरेंद्र मोदी के बगल में, एक बेबस, लाचार और समर्पण कर चुका व्यक्ति है. इसमें आत्वविश्वास की कमी है. खुद पर भरोसे की कमी है.

फिर उस बुजुर्ग ने याद दिलाया कि 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान जितनी भी जनसभायें नीतीश कुमार ने संबोधित की हैं उन भाषणों के टेप मिल जायें तो जरूर सुनिए. नीतीश कुमार की बेचारगी, बेबसी और आत्मविश्वास की भारी कमी का अंदाजा लग जायेगा.

  •  कभी भाजपा तो कभी राजद का हाथ थाम कर नीतीश ने अपनी विश्वसनीयता खो दी

  • आज नीतीश खुद पर भरोसा करने के बजाये मोदी के सहारे वोट मांगने को मजबूर हैं

  • कभी मिट्टी में मिल जाने लेकिन भाजपा का हाथ नहीं थामने की करते थे बात

बुजुर्ग ने दो मिसालें सामने रखी. पहली पालीगंज की और दूसरी जहानाबाद के कलेर की. पालीगंज में नीतीश कुमार, पीएम नरेंद्र मोदी के साथ थे. यहां रामकृपाल यादव के लिए चुनाव सभा रखी गयी थी. दूसरी सभा जहानाबाद वाली थी. यहां नीतीश अकेले थे. लेकिन इन दोनों सभाओं में नीतीश की वाणी एक सी थी. दोनों सभाओं में नीतीश ने कहा कि माननीय नरेंद्र मोदी ने देश की प्रतिष्ठा बढ़ाई है. आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब दिया है. माननीय प्रधान मंत्री ने बिहार को भरपूर आर्थिक सहायता दी है जिसके चलते बिहार का विकास हो रहा है.

हो यही रहा है. लगभग डेढ़ महीने तक चलने वाले चुनावी सभाओं के दौरान नीतीश खुद अपने कामों, अपनी उपलब्धियों के बजाये नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगते रहे हैं. जिन सभाओं में वह पीएम मोदी के साथ होते थे, वहां उनकी तारीफ में कशीदे तो पढ़ते ही हैं, लेकिन जहां अकले खुद ही होते हैं वहां भी नीतीश, नरेंद्र मोदी की छाया से खुद को नहीं निकाल पाये.

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यह, वही नीतीश कुमार हैं जो 2009  के लोकसभा चुनाव के बाद एक कद्दावर राष्ट्रीय नेता की संभावनायें लिए उभरे थे. और तब गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र दामोदर मोदी को बिहार की धरती पर कदम रखने के लिए नीतीश कुमार से इजाजत लेना जरूरी शर्त थी.

यह वही दौर था जब दंगों से जल चुके गुजरात के इस विवादित मुख्यमंत्री को अमेरिका में कदम रखने की इजाजत नहीं थी तो बिहार में प्रवेश भी नीतीश की सहमति के बिना मुमकिन नहीं था.

2009 में अपने 20 सांसद लोकसभा में पहुंचाने वाले नीतीश कुमार को उनकी पार्टी अगले प्रधान मंत्री के रूप में देखने लगी थी. एक व्यापक रणनीति के तहत जदयू के प्रवक्ता नियमित रूप से नीतीश को एक वैकल्पिक राष्ट्रीय नेता के रूप में पेश  करते नहीं थकते थे. भाजपा के दिग्गजों और धुरंधरों की इतनी औकात नहीं थी कि वे नीतीश कुमार के साथ उनकी पंक्ति में खड़े हो जायें. जो नीतीश के सामने खड़े होते भी थे तो वे नीतीश की प्रशंसा और गुनगान में लगे होते थे. इन लाल कृष्ण आडवाणी भी शामिल थे.

कहां से कहां आ गये नीतीश

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव  नतीजे ने नीतीश कुमार के रुत्बे को रेत की दीवार की तरह भरभरा के गिरा दिया. नीतीश ने तब आखिरी दाव खेला था अपने रुत्बे को बचाने के लिए. उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतन राम मांझी को ठीक वैसे ही गद्दी सौंप दी थी जैसे कोई शहंशाह अपना तख्त अपने किसी मनसपसंद व मातहत व्यक्ति के हवाले करके चार धाम की यात्रा पर निकल पड़ता है.

 

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यह नीतीश कुमार के रानीतिक जीवन के सबसे बड़े बलंडरों में से एक था. नीतीश ने खुद भी कालांतर में यह स्वीकारा था. लेकिन उसके बाद से लगातार नीतीश बलंडर पर बलंडर ही करते रहे. भाजपा से गठबंधन का नाता तोड़ना. राजद से गठबंधन बना कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचना. फिर रातों रात राजद को धोखा दे कर भाजपा में वापसी करना और फिर मुख्यमंत्री की शपथ ले लेना. यह सब एक अहंकारी शहंशाह के बेलगाम फैसलों से कम नहीं थे. इसी दौरान यह भी याद दिलाता चलूं कि भाजपा को सावर्वजनिक रूप से बेइज्जत करके उनके तमाम मंत्रियों को अपने कैबिनेट से निकाल बाहर करने का फैसला नीतीश कुमार पहले ही ले चुके थे.

 

लेकिन अब यह क्या हो गया है नीतीश कुमार को ?

आज नीतीश का सियासी आत्मबल खाक में मिल चुका है. अपने विकास कार्यों की बदौलत बिहार की जातिवाद की जकड़न वाली राजनीति को मुक्ति दिलाने की घोषणा करने वाले नीतीश बुरी तरह पस्त हो चुके हैं. उनकी इस नैतिक पस्ती की वजहें भी हैं. राजद के साथ रहते हुए जीतने के बाद फिर भाजपा में चले जाने के उनके फैसले ने मुसलमानों को यह ताअस्सुर दिलाया कि नीतीश ने उनकी पीठ में छुरा घोपा है. इसी तरह यादवो की बड़ी आबादी ने भी माना लिया कि लालू प्रसाद की पीठ में खंजर चलाने वाले नीतीश अब भरोसे के काबिल नहीं हैं.

सात चरण के चुनावों में से छह चरण बीत चुके हैं. नीतीश का जदयू 17 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. कुल मिला कर पार्टी की हालत अच्छी नहीं मानी जा रही है. नीतीश के समर्थन में को बड़ा जातीय आधार खड़ा नहीं दिख रहा है. ले दे कर ऐसे में स्वाभाविक तौर पर नीतीश को खुद पे भरोसे के बदले नरेंद्र मोदी और भाजपा के वोटरों से ही उम्मीदें हैं. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर नीतीश ने  मोदी के सामने समपर्पण कर दिया है.

यह नीतीश की बेबसी है. यही उनकी बाचारगी है.

 

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