बिहार की राजनीति में नयी धमक की तैयारी:मुसलमानों में ‘सोशल जस्टिस’ का ये है नीतीश फार्मुला

इन दिनों जदयू व भाजपा के रिश्तों में अदृश्य कड़वाहट है. राजद मुस्लिम यादव सियासत के नुस्खे पर कायम है.भाजपा अपने ट्रेडिशनल वोटरों में लगी है. ऐसे में नीतीश मुसलमानों में ‘सामाजिक नयाय’ का नया फार्मुला गढ़ कर राजनीति का एक नया सिरा तलाशने में जुट गये हैं. 

यह विज्ञापन पटना में लगाया गया है जहां लाखो मुसलमान 15 अप्रैल को जुटेंगे

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इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम, फॉर्मर फेलो, इंटरनेशनल फोर्ड फाउंडेशन

भले ही भाजपा व जदयू औपचारिक रूप से कुछ भी कह लें. लेकिन सच्चाई यह है कि  पिछले कुछ दिनों से दोनों दलों के बीच एक मनमुटाव बढ़ा है. रामनवमी के बाद भड़के साम्प्रदायिक दंगों पर नीतीश कुमार द्वारा भाजपा को परोक्ष रूप से घिड़की दिया जाना, पीएम मोदी की मौजूदगी में यह कहना कि तनाव और टकराव से विकास संभव नहीं और फिर मुम्बई में जा कर यह कहना कि पूरे देश में तनाव का माहौल है. ये तमाम बातें नीतीश कुमार की नयी रणनीति का हिस्सा हैं. प्रशासनिक कामों में भाजपा के एक खेमे की तरफ से सरकार पर दबाव. साम्प्रदायिक हिंसा में गिरफ्तार हो रहे लोगों पर भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा सीधे डीजीपी से शिकायत करना. या फिर राबड़ी देवी के आवास से सुरक्षा गार्डों की वापसी जैसे अनेक मुद्दे हैं जिससे यह लगने लगा है कि नीतीश कुमार के प्रशासनिक दायरे में हस्तक्षेप की कोशिश हो रही है. इन घटनाओं से समाज में यह मैसेज जा रहा है कि नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से कमजोर हुए हैं. लेकिन नीतीश  राजनीति में इतनी आसानी से किसी को वॉक आवर देने वाले नेता नहीं हैं. इन घटनाओं के समय में नीतीश कुमार से रामविलास पासवान  व एनडीए के अन्य नेताओं का मिलना. या एक नये वैकल्पिक प्लेटफॉर्म के आकार लेने के कायसों की चर्चा होना. ये सब नये राजनीतिक की सुगबुगाहट, हो ना हो पर यह तय है कि नीतीश अपने वोट आधार को विस्तार देने की नयी रणनीति में जुट चुके हैं. ऐसे में यह याद रखना जरूरी है कि भाजपा, अपरकास्ट, अतिपिछड़ी जातियों के कुछ समूहों के अपने ट्रेडिशनल वोट आधार को मजबूत कर रही है. राजद अपने पारम्परिक मुस्लिम यादव वोटरों व कुछ पिछड़ी जातियों पर पकड़ मजबूत बनाये रखने में लगा है. लेकिन दूसरी तरफ नीतीश  मुसलमानों में सामाजिक न्याय के विस्तार में जमीन तलाशने की रणनीति पर काम करके अपने विरोधियों की जमीन खोदने की तैयारी में हैं.

 

इन दिनों नीतीश सरकार एक विज्ञापन को बड़े जोर-शोर से लोगों तक पहुंचाने में लगी है. 15 अप्रैल को पटना के गांधी मैदान में लाखों मुसलमानों के दीन बचाओ, देश बचाओ रैली में आने की तैयारी है. गांधी मैदान के किनारों पर बिहार सरकार ने एक विज्ञापन लगा रखा है. इसमें मुसलमानों के विकास के लिए महत्वपूर्ण योजनाओं की चर्चा है. इस विज्ञापन में अल्पसंख्यकों के विकास से जुड़े तीन महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये गये हैं.

चार सूत्री फार्मुला

इनमें- मदरसों के विकास के लिए महती योजना, हर जिले में वक्फ की जमीन पर बहु उद्देश्यीय भवन का निर्माण कराना, जिलों में अनुसूचित जातियों की तरह अल्पसंख्यकों के लिए आवासीय विद्यालय बनवाने जैसी योजनाओं का जिक्र है. पर जो चौथी योजना है वह राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है. इस चौथी योजना के तहत मुसलामानों में सामाजिक न्याय के एक नये फार्मुले को मूर्त रूप देने की तैयारी है. इसके तहत सरकार धुनिया, रंगरेज और दर्जी बिरादरियों पर केंद्रित विकास की एक बड़ी योजना पर काम कर रही है. कुछ लोगों को याद होगा कि आज से छह सात वर्ष पहले सरकार ने एक निगम के गठन का ऐलान किया था. नाम था ‘धुरद’ . तीन अक्षरों का यह नाम धुनिया, रंगरेज और दर्जी बिरादरियों के पहले अक्षरों से लिया गया है. तब सरकार इस योजना पर किसी कारण आगे नहीं बढ़ सकी थी. लेकिन अब पूरी तैयारी है. धुनिया, रंगरेज और दर्जी तीन ऐसी बिरादरियां हैं जो राजनीतिक रूप से काफी पिछड़ी हैं लेकिन वोटशक्ति के लिहाज से यह समूह सम्मिलित रूप से बहुत प्रभावशाली है. इन बिरादरियों की भारी आबादी होने के कारण नीतीश इन्हें अपने फोल्ड में खीचने की स्ट्रैटजी बना रहे हैं. अगर वह इसमें कामयाब हो गये तो मुसलमानों की स्थापित राजनीतिक फार्मुले पर काम करने वाले दलों को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

पहले भी कामयब रही है सोशल इंजीनियरिंग

 

नीतीश कुमार सोशल इंजीनियरिंग के ऐसे फार्मुले गढ़ कर  पहले भी कामयाब राजनीति कर चुके हैं. महादलित व पसमांदा राजनीति के नुस्खे वह 2005 और 2010 में आजमा चुके हैं. नतीश के इस फार्मुले का खामयाजा दलित राजनीति करने वाले रामविलास पासवान की लोसपा और अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले राष्ट्रीय जनता दल भुगत चुके हैं.  नीतीश की इस नये सोशल इंजीनियरिंग में  ‘टोटल मुस्लिम’ पालिटिक्स करने वाले राष्ट्रीय जनता दल व कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. सेक्युलर राजनीति करने वाले दल हिंदुओं में सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मुसलमानों में आजमाने से इसलिए गुरेज करते हैं क्योंकि  उन्हें बिना मेहनत के मुसलमानों का एक मुश्त वोट मिलता रहा है. नीतीश कुमार इसी पारम्परिक सियासत को बदलने का जोखिम उठा रहे हैं. उनके इस प्रयास को समाज के बड़े हिस्से का समर्थन भी प्राप्त हो सकता है क्योंकि सामाजिक न्याय का विस्तार हिंदू समाज के बाहर होने की पूरी संभावना भी है.

 

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