एडिटोरियल कमेंट:बेबस नीतीश के जबड़े से पप्पू छीनते जा रहे हैं विशेष राज्य का आंदोलन

जिस विशेष राज्य के दर्जे के आंदोलन ने परवान चढ़ाया था, उसे  पप्पू यादव नीतीश की झोली से झपटते जा रहे हैं. नीतीश इस मामले पर बेबस हैं और लगता है कि उनके हाथ से यह मुद्दा छूटता जा रहा है.

 

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इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

नीतीश कुमार ने 2008-09 तक इस मुद्दे को चरम पर पहुंचा दिया था. इसी क्रम में उन्होंने एक करोड़ बिहारियों के दस्तखत ले कर केंद्र सरकार को भेजा था. दर्जनों सेमिनार, प्रदर्शन, धरना और यहां तक राजनीतिक बारगेनिंग की कोशिश उन्होंने की थी. यह नीतीश थे जिन्होंने  विशेष राज्य के दर्जे को चुनावी मुद्दा बना डाला था. 2009 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा गठबंधन में रहते हुए उन्होंने यहां तक कह डाला था कि केंद्र की सरकार गठन में उनकी पार्टी मनमोहन सिंह को भी समर्थन कर सकती है,अगर कांग्रेस इस मांग को पूरी करने का वादा कर ले. लेकिन 2009 में मनमोहन सिंह को नीतीश के समर्थन की जरूरत तक नहीं पड़ी.

 

फिर 2014 के लोकसभा आते आते, नीतीश अलग-थलग पड़ गये. और मोदी की सरकार बन गयी. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद 2015 के विधान सभा चुनाव में मोदी ने खुद ही बिहार की सभाओं में घूम-घूम कर घोषणा की कि उनकी सरकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगी. अचानक 2017 की 26 जुलाई को जब नीतीश ने लालू से अलग हो कर भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना ली तब से नीतीश इस मुद्दे पर चुप हैं. उनकी चुप्पी बेबसी का रूप ले चुकी है. दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को साफ नकार दिया. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तो एक बार यहां तक कहा कि वह चुनावी बात थी, एक राज्य को विशेष दर्जा देने का मतलब है कि ऐसी मांगे और राज्यों से उठेने लगेंगी.इसलिए यह संभव नहीं है.

एक तरह से मोदी सरकार ने नीतीश को गच्चा दे दिया. लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि नीतीश इस मुद्दे पर बेबस हैं. वह पत्रकारवार्ताओं और कभी कभी नीति आयोग की बैठकों में ऐसी मांगों की औपचारिकता को पूरी कर के चुप हो जाते हैं. जबकि इसी मुद्दे पर केंद्र की एक अन्य सहयोगी तेलगू देशम पार्टी( टीडीपी) ने एनडीए से समर्थन वापस ले लिया और सरकार से भी अलग हो गयी. तब तेजस्वी ने नीतीश को नसीहत भी दी थी कि वह टीडीपी से कुछ सबक लें. फिर भी नीतीश इस मुद्दे पर बेबस रहे, खामोश रहे.

लेकिन बिहार में इस मुद्दे को जन अधिकार पार्टी के नेता पप्पू यादव ने बड़ी जोर शोर से उठाना शुरू कर दिया है. हाल ही में उन्होंने बिहार बंद, रेल रोको, चक्का जाम आदि आंदोलन कर चुके हैं. आज ही पप्पू यादव ने संसद में इस मुद्दे पर कार्यस्थगन प्रस्ताव भी पेश किया है.

इस आंदोलन का क्या नतीजा निकलेगा यह तो वक्त ही बतायेगा. लेकिन अभी तक के जो राजनीतिक हालात दिख रहे हैं उससे लगता है कि पप्पू यादव, नीतीश कुमार के इस आंदोलन को उनके हाथ से छीनते जा रहे हैं. और नीतीश हैं कि सत्ता की बेबसी के आगे खामोश बने रहने को बाध्य हैं. हालांकि अब भी पप्पू के इस आंदोलन में वह धार नहीं है जैसी धार नीतीश कुमार ने दी थी.

इस मामले में खास बात यह भी है कि राजद भी बहुत सक्रिय नहीं दिख रहा है. समय समय पर तेजस्वी यादव इस मुद्दे को उछालते जरूर हैं पर विशेष राज्य के दर्जे को आंदोलन का रूप देने में पप्पू यादव ही लगे हैं.

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