‘हक की बात’ क्या 30 लाख प्रवासियों का विद्रोह बिहारी सत्ता को उखाड़ फेकागा?

क्या आपने गौर किया कि लॉकडाउन की दो हमीने की अवधि में सोशल मीडिया पर 800 से ज्यादा विडियो वॉयरल हुए जिनमें नीतीश-मोदी सरकार के खिलाफ गंभीर असंसदीय शब्दों में बगावती सुर देखे गये?

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Irshadul Haque, Editor naukarshahi.com

यह बिहार के प्रवासी श्रमिकों की असहनीय पीड़ा से उपजी बिहार सरकार के खिलाफ उनकी प्राकृतिक अभिव्यक्ति है. इन विडियोज में ये युवा खुले शब्दों में नीतीश कुमार और सुशील मोदी के खिलाफ असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करते दिख रहे हैं. वे अपना आक्रोश जता रहे हैं क्योंकि नीतीश कुमार ने बिहार के बाहर फंसे Reverse Migration को बेचैन लोगों को राज्य में आने की अनुमति देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि इससे ‘लॉकडाउन को कोई औचित्य’नहीं रह जायेगा.

पनप रहा है विद्रोह

बिहार के बाहर, राज्य के श्रमिक रोटी के लिए बिलखते-तरसते रहे. उनके मकान मालिकों ने किराया ना चुकाने के कारण बेघर कर दिया. लाकडाउन के कारण फैक्ट्रिया बंद होने से उनका रोजगार छिन गया. ऐसे में, हर असहाय की तरह बिहारी श्रमिक अपने मातृ प्रदेशों, अपने बीवी बच्चों के पास, हर हाल में लौट आना चाहते थे. लेकिन प्रदेश के मुखिया की हठधर्मिता ने उन्हें मायूस किया और वे पैदल, साइकिलों से, अपने ही रिक्शे से, ट्रकों में खूद को असबाब की तरह ठूस कर घरों को चल पड़े थे. लेकिन बिहार, जो अपनी भूमि है, वहां की सरहदों में प्रवेश की उन्हें अनुमति नहीं थी.

नीतीश-मोदी की हठधर्मिता, चुकानी होगी कीमत

हालांकि बाद में, काफी दबाव के बाद नीतीश सरकार ने अपने रुख में नर्मी बरती और उन्हें घर बुलाने पर राजी तो हो गयी, पर श्रमिकों की समस्यायें और विकराल ही हो गयीं. ट्रेनों से हर रोज 50 हजार से एक लाख तो लोग बिहार आने लगे. ये सरकारी रिकार्ड हैं. जबकि हजारों ऐसे भी श्रमिक थे जो निजी वाहनों को भाड़े पर ले कर, पैदल, या रिक्शे, साइकिलों से आ रहे हैं. आते ही उन्हें नियमानुसार क्वारनटाइन में ठूस दिया जा रहा है. कुछ क्वारनटाइन सेंटरों को, जो आइडियल हैं, उनकी बातें छोड़ दें तो बिहार के पचास हजार के करीब क्वारनटाइन सेंटर एक तरह से प्रताड़ना गृह से कम नहीं हैं. वहां उन्हें 21 दिनों की मियाद पूरी करनी होती है. जहां भोजन की निम्नस्तरीय क्वालिटी, रूखा चूड़ा, आधा पेट भोजन पर गुजारा करना होता है. आवसन के नाम पर सुविधाविहीन स्कूलों, पंचायत भवनों में ठूस-ठूस कर रखे गये प्रवासियों के लिए परदेश की यातनाओं जैसी पोजिशन में फिर से 21 दिन बिताना, उनके आक्रोश को कम करने के बजाये बढ़ाती चली गयी.

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एक तो रोजगार छूट जाने का गम. उस पर से दो महीने की प्रताड़ना भरी जिंदगी. और फिर सरकार का क्रूर रवैया. इन सबने मिल कर प्रवासियों में विद्रोह की आग को भड़का दिया है. अब तो क्वारनटाइन सेंटरों से भी, जहां पत्रकारों को जाने पर पाबंदी है, प्रवासी अपनी यातना भरे दिनचर्या के विडियो वॉयरल कर अपना विद्रोह जता रहे हैं.

सवाल यह है कि क्या श्रमिकों के यह बगावती तेवर अस्थाई हैं? क्या शारीरिक व मानसिक पीड़ा का दौर समाप्त होने के साथ उनकी हाकिमे वक्त के साथ उनकी नाराजगी खत्म हो जायेगी?

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इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले, उस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है कि क्या उनकी पीड़ा, साल भर या छह महीने में समाप्त होगी भी या नहीं. चलिए मान लिया जाये कि आने वाले दो महीने में उनकी शारीरिक व मानसिक पीड़ा का दौर खत्म हो जायेगा. लेकिन उसके बाद जो आर्थिक पीड़ा उनका इंतजार कर रहा है, वह मौजूदा पीड़ा से भी भयावह दिख रहा है.

अब जरा गौर करें

बिहार के स्किल्ड, सेमी स्किल्ड और ननस्कील्ड कोई 25 से 30 लाख लेबरर का रोजगार छिन चुका है. यह आंकड़ें, खुद बिहार सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किये गये प्रवासी, श्रमिकों के हैं. जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी. ये ऐसे श्रमिक हैं जिन्हें बिहार में कृषि क्षेत्र में रोजगार नहीं मिलने के कारण Migrate करके अन्य राज्यों में चले गये थे. अब इनका Reverse Migration हो रहा है. इस तरह 30 लाख श्रमिकों पर आश्रित सदस्यों ( जिनमें बीवी, बच्चे, मां-बाप आदि शामिल हैं) की संख्या कम से कम दो करोड़ बनती है. गोया अब दो करोड़ लोगों की रोटी का संकट बिहार पर मंडरा रहा है. जएएनयू के अर्थ शास्त्री Santosh K Mehrotra का आकलन है कि यह संकट 2021 से आगे तक बनी रह सकती है. जबकि विश्व बैंक ने तो पहले ही भुखमरी की भविष्यवाणी कर रखी है.

अब ऊपर किये गये सवालों का जवाब, इन संभावनाओं में तलाशिये. सार यह है कि श्रमिकों की मानसिक पीड़ा के बाद बेरोजगारी व भुखमरी की पीड़ा आने वाली है वह उनके बगावती तेवर को और बढ़ाने ही वाली है. ऐसे में वे सत्ता से सवाल करेंगे. वह सरकार को घेरेंगे और जवाब ना मिलने पर अपना फैसला सुनायेंगे.

फैसला सुनायेंगे श्रमिक

लाकडाउन व कोरोना संकट के समय में भारत में पहला चुनाव बिहार में होने वाला है. नवम्बर तक अगली विधान सभा का गठन हो जाना है. नवम्बर में होने वाले चुनाव में यह मुद्दा किसी के रोके नहीं रुकने वाला. स्वाभाविक है नीतीश कुमार व सुशील मोदी के माथे पर चिंता की लकीर कोई भी आदमी पढ़ सकता है.

Opposition के लिए अवसर

रास्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, वामदल, जनअधिकार पार्टी जैसे दलों के लिए राजनीति का बड़ा, और बिन मांगे एक राजनीतिक हथियार मिल गया है. यही कारण है कि राजद ने अपना आक्रामक रुख तय कर लिया है. तेजस्वी यादव ने अपने लिए मुद्दों की परिधि तय कर ली है. वह लाकडाउन के पहले दिन से श्रमिक प्रवासियों के फेवर में खुल कर बोल रहे हैं. राजद ने लाखों प्रवासियों को महाराष्ट्र, तमिलनाडु,गुजरात,हरियाणा आदि प्रदेशों में राशन की व्यवस्था, बिहार सरकार से पहले की. इस मामले में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी भी काफी सक्रिय रही. वाम दलों ने भी इसे आंदोलन के रूप में लिया है.

किसके वोटर्स हैं प्रवासी श्रमिक

अगर 30 लाख प्रवासी श्रमिकों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो इनमें 95 प्रतिशत बैकवर्ड, अनुसूचित जाति व अल्पसंख्यक समुदाय के हैं. ये समूह पारम्परिक रूप से गैरभाजपा वोटर्स रहे हैं. लेकिन 2014 से इनमें से एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चला गया है. लेकिन अब इन्हें अपने पिछड़े, दिलत होने का एहसास हुआ है. ऐसे में राजद, व वामपंथी दलों ने भी इस मामले को बखूबी समझा है. ये पार्टियां श्रमिकों की भुखमरी, बेरोजगारी की प्रताड़ना की आंच को धीमा नहीं होने देंगे.

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