SaatRang : मोदी के मुफ्त अनाज से टूटी कृष्ण-कर्ण परंपरा

SaatRang : मोदी के मुफ्त अनाज से टूटी कृष्ण-कर्ण परंपरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गरीब कल्याण अन्न योजना प्राचीन भारतीय परंपरा, कृष्ण और कर्ण की दान की महान परंपरा के विपरीत है।

आजकल प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत गरीब को पांच किलो अनाज दिए जाने का खूब प्रचार है। थैले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी तस्वीर है। हर जगह समारोह करके यह अनाज का थैला दिया जा रहा है। अनाज लेते हुए गरीब हीन भाव से भरे दिख रहे हैं और थैले पर प्रधानमंत्री की मुस्कुराती तस्वीर। थैला देते हुए एक साथ कई नेता फोटो खिंचवा रहे हैं। नेता गर्व से भरे हैं और गरीब याचक की तरह दीन।

हम सब बचपन से कृष्ण और सुदामा की कहानी पढ़ते आए हैं। कृष्ण और सुदामा गुरुकुल के सहपाठी थे। सुदामा बेहद गरीब थे। वे कृष्ण से मिलने जाते हैं। दिया तो सुदामा ने भी, लेकिन उसके देने की चर्चा तुच्छ के तौर पर ही होती है। और कृष्ण? कृष्ण ने सुदामा को तीनों लोक का वैभव दिया। लेकिन बताकर नहीं दिया। दरबार में कोई घोषणा न की। अगर प्रचार करके देते, तो कृष्ण छोटे हो जाते। उनका प्रेम, प्रेम न रह जाता। ओशो कहते हैं, प्रेम हमेशा देता है। वह देकर कभी जताता नहीं कि देखो मैंने यह दिया। प्रेम में देने की घोषणा नहीं होती।

हिंदी-उर्दू के बड़े साहित्यकार प्रो. जाबिर हुसेन कर्ण की याद दिलाते हैं। कर्ण रोज सुबह स्नान और सूर्य पूजा के बाद दान देते थे। पांडवों की जीत के लिए वेष बदल कर इंद्र ने उनका कवच-कुंडल मांग लिया। कर्ण ने सबकुछ जानते हुए भी दे दिया। कवच-कुंडल के रहते उन्हें कोई नहीं मार सकता था। कुंती ने मांगा, तो उन्हें भी दिया। कहा, आप हमेशा पांच पुत्रों की माता रहेंगी। वे सिर्फ अर्जुन को मारेंगे। कर्ण ने दान देते हुए कोई प्रचार नहीं किया। इसीलिए वे महादानी कहलाए।

हमारे देश की पुरानी परंपरा रही है कि दायां हाथ दे, तो बाएं को पता न चले। इस परंपरा के गहरे अर्थ हैं। इस तरह देने में देनेवाला बड़ा नहीं होता और न पानेवाला छोटा होता है। देनेवाले में अहंकार का भाव नहीं जन्म लेता। पानेवाला भी यहां याचक नहीं होता, देनेवाला पानेवाले के स्वाभिमान की रक्षा करता है।

भारत के गरीब पहले भी सरकारी राशन दुकान से अनाज पाते थे। नाममात्र के पैसे देकर थैला भर अनाज लाते थे। सरकारी दुकान से मुफ्त अनाज पाकर वे हीनभाव से भर नहीं जाते थे। उनका स्वाभिमान बचा रहता था। इसीलिए कभी देर होने पर, अनाज की क्वालिटी खराब होने पर गरीब हंगामा तक कर देते हैं। वे अधिकार समझते हैं।

अब जो प्रधानमंत्री अन्न योजना से मुफ्त अनाज पा रहे हैं, वे जिंदा तो हैं, पर जिंदा नहीं। स्वाभिमान मर गया। यूपी, मध्यप्रदेश के जो आंकड़े बताए जा रहे हैं, उसके अनुसार आधी से ज्यादा आबादी को मुफ्त अनाज दिया गया। इसका अर्थ है आधी से ज्यादा आबादी दीन-हीन भाव से भर गई। कृष्ण के देने में राष्ट्र कमजोर नहीं होता, पर इस तरह प्रचार करके दीन-हीन भाव से भर देने का क्या असर होगा? सोचनेवाली बात है कि स्वाभिमान के बिना कोई राष्ट्र कैसे मजबूत हो सकता है। क्या हीनभाव से भरे लोग स्वाभिमानी राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं?

देता तो गरीब भी है, पर वह प्रचार नहीं करता। सुदामा ने भी कृष्ण को दिया था। सुदामा ने जो दिया, वह कृष्ण के देने से कम कीमती नहीं था। ओशो कहते हैं सुदामा सिर्फ तीन मुट्ठी चावल ले गए थे। देने में भी संकोच कर रहे थे। कृष्ण ने उनकी पोटली प्यार से छीन ली। और भरे दरबार में फांक कर खाने लगे। सुदामा का तीन मुट्ठी चावल सोने -चांदी से कम नहीं था। सुदामा की गरीबी का ख्याल करिए और उनके अगाध प्रेम को देखिए, तब पता चलेगा उस तीन मुट्ठी चावल का मूल्य। सुदामा प्रेम से भरे थे और प्रेम करनेवाला देना ही जानता है। भारत का गरीब भी देता है। टैक्स देता है। वोट देकर किसी को सत्ता तक पहुंचाता है। क्या उसका वोट कम कीमती है?

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एक अमीर व्यक्ति के दान में और सरकारी पद पर बैठे सरकारी खजाने से दान में जमीन-आसमान का पर्क है। अमीर अपनी कमाई का एक हिस्सा देता है, सरकारी व्यक्ति जनता का ही धन जनता में बांटता है। फिर वह दाता और गरीब याचक क्यों?

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