विचारधारा पर लौट कर ही तय होगा सिफर से शिखर का सफर

माया-अखिलेश की जोड़ी अब राष्ट्रीय राजनीति पर साथ मिल कर अपने राजनीतिक सिद्धांतों पर लौट रहे हैं. उन्हें  एहसास हो चुका है कि विचारधारा से भटक कर वे अपने अस्तित्व को बचा नहीं सकते, जबकि तेजस्वी यादव ने सामाजिक न्याय पर मुखरता से आगे बढ़ कर अपना जनाधार पहले ही बढ़ा लिया है.
मायावती अचानक राष्ट्रीय पटल पर है। ऐसा क्यों? यह समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़ना होगा। बसपा मान्यवर कांशीराम के बहुजन आंदोलन से उपजी पार्टी है। बसपा की स्थापना वर्ष के दस साल बाद पहली बार यूपी में बसपा की सरकार बनी। 22 वर्ष बाद 2007 में बसपा सुप्रीमो अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त कर मुख्यमंत्री बनी।

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संजय यादव, राजनीतिक सलाहकार नेता प्रतिपक्ष, बिहार विधानसभा
लेकिन वह सरकार कांशीराम के मूल नारों और वैचारिक राजनीति से थोड़ा हटकर बनी।
जिन नारों के साथ मान्यवर कांशीराम आजीवन  मनुवादी शक्तियों से लड़ते रहे। बहनजी ने उन्हीं मनुवादीयों के साथ मिल, नए नारे गढ़ कर  सरकार बना ली। पार्टी अपने मूल विचार से भटकने लगी। परिणाम हुआ कि बहनजी के सीएम रहते दो साल बाद हुए 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा कुछ ख़ास प्रदर्शन नहीं कर सकी और अपने पहले की संख्या में मात्र 2 सीट का इज़ाफ़ा कर पायी. 2012 में प्रदेश सरकार गँवाई और फिर 2014 लोकसभा चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद खाता भी नहीं  खोल सकी.
सनद रहे 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 6.17% वोट के साथ 21 सीटें मिली थी।
आदर्शों से भटकी, रसातल में पहुंची बसपा
2007 में विधानसभा में 206 सीट जीतने वाली बसपा 2017 के विधानसभा चुनाव में महज़ 19 सीटों पर सिमट गयी। मतलब अब कांशीराम की बसपा अपने बूते एक राज्यसभा सांसद भी नहीं भेज सकती। 2007 से 2017 यानि 10 वर्ष तक बसपा अपने मूल सिद्धांत और विचार से भटकने के कारण रसातल में चली गई।
पतन के बाद भी वामपंथियों से बड़ा आधार
आंदोलन और विचार पर अडिग लोगों ने फिर भी इस पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। वर्तमान लोकसभा में शून्य सीट होने के बावजूद 4.1 वोट प्रतिशत के साथ बसपा देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। वामपंथियों से भी बड़ी।
बसपा के साथी, अखिलेश के किचन कैबिनेट में
कमोबेश यही हाल समाजवादी पार्टी का रहा। 2012 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के बाद अखिलेश के नए समाजवादी लोग विचार और समाज को भूल ख़ाली ‘वादी’ रह गए। जो लोग मायावती की किचन कैबिनेट में थे वही लोग उम्र, चेहरा और नाम बदलकर अखिलेश की मॉड्यूलर किचन कैबिनेट में सम्मिलित हो गए। मायावती की तरह अखिलेश के सीएम रहते दो वर्ष बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में सपा तो मात्र परिवार तक सिमटकर महज़ 5 सीटें ही जीत सकी और 2017 तक आते-आते प्रदेश भी बुरी तरह से गँवा दिया। मायावती से भी बुरी तरह।
    विचारधारा से डिगने का खामयाजा
ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के दबाव और दलित-पिछड़ा राजनीति के पैरवीकारों ने सपा और बसपा नेतृत्व को वर्तमान परिस्थिति और बहुजन राजनीति पर मँडराते ख़तरों के चलते नज़दीक आने को मजबूर किया है। विचारधारा से डिगने पर सपा और बसपा को बहूजनों ने कड़ा सबक़ सिखाया। उन्हें मजबूर किया कि दोनों दल साथ-साथ आए। यहाँ दोनों पार्टियों को कई मुसीबतों का सामना कर रहे लालू प्रसाद से सिखना चाहिए। कैसे उनकी पार्टी सत्ता और विपक्ष में रहते हुए हमेशा अपनी विचारधारा पर अडिग रहती है। शायद यही कारण है की राज्य और केंद्र में सपा और बसपा से ज़्यादा लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल रही है।
अखिलेश की ऊहापोह, तेजस्वी की मुखरता
अखिलेश यादव जहाँ विकास के आवरण तले सामाजिक न्याय की बात करने में शर्माते और सकुचाते थे वहीं तेजस्वी ने कुछ महीनों सत्ता में रहते हुए नए तौर-तरीक़ों से धड़ाधड़ विकास कार्य भी किए और खुलम-खुल्ला अपनी विचारधारा और एजेंडे को मुखरता से रखा भी। लालू प्रसाद के मार्गदर्शन में तेजस्वी यादव ने इस फार्मुले का सफल प्रयोग किया है. नतीजा सामने है. हाल में बीते उपचुनाव के परिणाम  इसके प्रमाण हैं.
लिहाजा अब  सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष सरोकारों की राजनीति करने वालों को यह ज्ञात हो गया है कि उन्होंने ग़लतियाँ की है और उन्हें दोबारा दलित-पिछड़ा एकता स्थापित करने के लिए तत्काल साथ आना होगा। उन्हें आभास हो गया है कि राजनीति में लम्बे समय तक टिकने लिए अपने विचार, सिद्धांत और नीति को त्यागना नहीं चाहिए।

 

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