सुप्रीम कोर्ट दलितों-पिछड़ों-मुस्लिमों के पक्ष में कभी नहीं रहा : प्राचा

सुप्रीम कोर्ट दलितों-पिछड़ों-मुस्लिमों के पक्ष में कभी नहीं रहा : प्राचा

वंचित तबकों के लिए आवाज उठानेवाले अधिवक्ता महमूद प्राचा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों के पक्ष में कभी नहीं रहा।

आंबेडकरवादी अधिवक्ता महमूद प्राचा ने मराठा आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कहा कि इस फ़ैसले में कुछ भी नया नहीं है। मुझे आज तक एक भी सही और सच्चे इंसाफ़ वाला फ़ैसला एससी-एसटी-ओबीसी और अल्पसंख्यक या महिलाओं के हक़ में नज़र नहीं आया।

प्राचा ने कहा कि अगर कहीं एक-आध फ़ैसला किसी हाईकोर्ट ने बहुजनों के पक्ष में दिया भी, तो सुप्रीम कोर्ट ने उस पर फ़ौरन रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपनी असहमति जताते हुए अधिवक्ता प्राचा ने कहा, जब तक राजनीतिक सत्ता बहुजनों के हाथ में नहीं आती, न्याय नहीं होगा । हां, इन नाजायज फ़ैसलों के ख़िलाफ़ धरना और प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट पर ही होना ज़रूरी है। इसकी सभी अंबेडकरवादी तय्यारी करें।

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उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रदर्शन करना ही पड़ेगा। इसके अलावा अभी इस अन्याय को रोकने का रास्ता नहीं है। हम लोग रिव्यू पिटिशन लगा लगा कर थक गए हैं। किसी के कान पर ज़ूं नहीं रेंगती।

मालूम हो कि 2018 में उस वक्त की महाराष्ट्र सरकार ने मराठा वर्ग को सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा में 16 प्रतिशत आरक्षण दिया था। कोर्ट ने कहा कि मराठा आबादी शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता। मराठा आरक्षण लागू करते समय 50 प्रतिशत की सीमा को तोड़ने का कोई संवैधानिक आधार नहीं था।

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सोशल मीडिया पर जैसे ही प्राचा ने अपना विचार रखा, अनेक लोग समर्थन में उतर आए। कई ने यह भी कहा कि उन पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा हो सकता है। लेकिन प्राचा पहले भी बहुजनों के पक्ष में आवाज उठाते रहे हैं। वे कोविड में सरकार की कुव्यवस्था पर भी लगातार मुखर रहे हैं। वे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कब धरना-प्रदर्शन करेंगे, इसकी तिथि अभी उन्होंने घोषित नहीं की है।

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