एडिटोरियल कमेंट:रोहिंग्या संकट पर अदालत के पक्ष से भाजपा का मानवता विरोधी चेहरा बेनकाब

रोहिंग्या शरणार्थी संकट पर सुप्रीम कोर्ट के रुख ने, केंद्र सरकार, भाजपा और आरएसएस की मानवता विरोधी मानसिकता को बेनकाब कर दिया है. सरकार और इन संगठनों को अब और छीछालेदर से बचने के लिए अपने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए.

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

सुप्रीमकोर्ट ने, भारत में रह रहे चालीस हजार से ज्यादा रोहिंग्यों को म्यांमार भेजने पर केंद्र सरकार के अडिग रहने के मामले में जो तर्क दिया है, वह उसके लिए शर्मशार करने वाला है. अदालत ने कहा है कि होहिंग्या संकट मानवता का बहुत बड़ा मामला है.

फौज के जुल्म से लाखों रोहिंग्यों को म्यांमार छोड़ना पड़ा

अदालत किसी की भावनाओं के अधार पर फैसला नहीं ले सकती. अदालत ने यहां तक कहा कि अगर कोई व्यक्ति आतंकी गतिविधियों में शामिल है तो केवल उस कराण पूरे समुदाय को दोषी नहीं माना जा सकता. आतंकी गतिविधियों से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाये लेकिन इसका मतलब यह कत्तई नहीं हो सकता कि उसकी सजा निर्दोषों को मिले. अदालत ने कहा है कि रोहिंग्या समुदाय के लोगों को म्यांमार भेजने के सरकार के फैसले पर फिलहाल रोक रहेगी और इस मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी.

 

अब केंद्र सरकार को इस पर अपना पक्ष स्पष्ट करना है.

गौरतलब है कि म्यांमार में फौज के हाथों भारी दमन, हत्या, बलात्कार और शारीरिक यातना के कारण लाखों रोहिंग्यों को अपना घर छोड़ कर विदेशों में जाना पड़ा है. भारत में लगभग चालीस हजार लोग शरण ले रहे हैं. केंद्र सरकार उन्हें अविलंब भारत से भेजने पर अडिग है. इसके खिलाफ रोहिंग्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और बताया कि उनके सामने मानवाधिकार का संकट है. लिहाजा उन्हें भारत में रहने दिया जाये. इस मामले में भाजपा और आरएसएस ने झूठी, बेबुनियाद और बेतुकी दलीलें देनी शुरू कर दी. इन संगठनों का कहना है कि रोहिंग्या समुदाय के कई लोग आतंकी गतिविधियों में शामिल हैं. इसलिए उनके, भारत में रहने से देश की सुरक्षा को खतरा है. यही रुख केंद्रीय गृहमंत्रालय ने भी रखा. गृहमंत्री राजनाथ सिंघ ने भी कुछ ऐसे ही सार्वजनिक बयान जा कर हलचल मचा दिया. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी रोहिंग्यों के खिलाफ नफरत भरी बयानबाजी शुरू कर दी.

 

पढ़ें- रोहिंग्यों को भारत से भेजने पर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी रोक

 

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों-  दीपक मिश्रा( चीफ जस्टिस), डीवाई चंद्रचुड और एएम खानमिलकर की बेंच ने केंद्र के कुतर्कों को सिरे से खारिज कर दिया.

वोटबैंक के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे कर इसे धर्म से जोड़ कर राजनीति शुरू कर दी. इस पार्टी के नेता और सोशल मीडिया पर उसके समर्थकों ने रोहिंग्यों को मुसलमान और आतंकवादी कहकर देश की फिजा को प्रदूषित करने का अभियान छेड़ दिया. इस पर अदालत का स्पष्ट कहना है कि संभव है कि कुछ रोहिंग्या आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े हों, पर केवल इस कारण हजारों निर्दोष और बेबस रोहिंग्यों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

अदालत ने जिस तरह से इस संकट का मानवता से जुड़ा संकट घोषित किया है, उसके बाद केंद्र सरकार की मानसिकता कठघरे में आ गयी है. गृहमंत्रालय ने शपथपत्र दे कर अदालत में उन्हें आतंकी तक कह डाला था. लेकिन अदालत ने उसके बेबुनियाद आरोपों की बखिया उधेड़ दी. ऐसे में अब गृहमंत्रालय को अपनी और फजीहत करवाने से बचने के लिए उस शपथ पत्र को वापस ले लेना चाहिए, वरना भारत के बाहर भी उसके रवैये की किरकिरी शुरू हो जायेगी.

यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि म्यांमार में जिन रोहिंग्यों पर सरकार और वहां की फौज जुल्म ढा रही है, उनमें भारतीय मूल के मुस्लिम तो हैं ही, हिंदुओं की आबाद भी शामिल है. साथ ही यह भी याद रखने की बात है कि श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान लाखों तमिल भारत आ गये थे. भारत ने उन्हें स्वागत किया था. भारत जैसे बहुसांस्कृतिक राष्ट्र की यह खूबी है कि वह मानवता के मुद्दे को सर्वपरि रखने की परम्परा का पोषक रहा है. ऐसे में केंद्र सरकार को अब और जिल्लत से बचने के लिए अब अपने रुख में बदलाव करना चाहिए.

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