बुद्धिजीवियों ने उठाई मांग, तस्लीमुद्दीन के सम्मान में रखा जाये हज भवन का नाम

सीमांचल के करोड़ों लोगों की आवाज और सीमांचल को पालिटिकल गुमनामी से निकाल कर बिहार के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने वाले तस्लीमुद्दीन के नाम पर पटना के हज हाउस का नामाकरण किये जाने की मांग सीमांचल मीडिया मंच व मुस्लिम पॉलिटकल काउंसिल ऑफ इंडिया  द्वारा आयोजित कार्यक्रम में की गयी.


यह कार्यक्रम बिहार उर्दू अकादमी में बुधवार को आयोजित किया गया.

पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन के सम्मान में  आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने तस्लीमुद्दीन के योगदान की खुल कर चर्चाकी. जदयू के विधायक और तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम ने उन्हें याद करते हुए कहा कि सियासत उनका ओढ़ना-बिछौना था. उनकी हर सांस सीमांचल के लोगों के लिए चलती थी. उन्होंने कहा कि उन्हें अपने जीवन में तस्लीम साहब से कभी परिवार की चिंता की बात नहीं सुनी. उनसे जबभी बात होती थी वह सीमांचल के विकास कैसे हो, इसी पर बात करते थे. उन्होंने कहा कि कोई तस्लीमुद्दीन नहीं बन सकता. लेकिन हमारी कोशिश होगी कि उनके अधूरे कामों को पूरा करने की कोशिश करेंगे.

बारी आजमी ने कहा कि सियासत में रहने वालों को पता है कि अपने बड़े नेताओं से अपनी बात कहने का साहस शायद ही कोई नेता करता हो, लेकिन तस्लीम साहब ने अपनी पार्टी के नेताओं की आंख में आँख डाल कर अपनी बात कहने का साहस रखते थे, यही खासियत उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती है. जमियत इस्लामी के अमीर  नैयरुज्जमा  ने उन्हें बड़ा रहनुमा बताया और कहा कि उन्हें जमाना भुला नहीं पायेगा. मुस्लिम काउंसिल आफ इंडिया के तस्लीम रहमानी ने कहा कि सरपंच से केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय करना कोई मामूल काम नहीं, जिसे तस्लीमुद्दीन जैसे नेता ही पूरा कर सकते थे.

तस्लीमुद्दीन किये गये याद

उर्दू अकादमी के सचिव मुश्ताक अहमद नूरी ने एक सरकारी अधिकारी के  रूप में तस्लीमुद्दीन के साथ काम करने के अपने अनुभवों को साझा किया. जबकि वरिष्ठ पत्रकार अशरफ अस्थानवी ने तस्लीमुद्दीन को बिहार का बड़ा नेता बताते हुए कहा कि दूर दूर तक फिलहाल कोई उनके कद का मुस्लिम नेता नहीं दिखता.

कार्यक्रम का संचालन करते हुए सीमांचल मीडिया मंच की कंवेनर व वरिष्ठ पत्रकार तसनीम कौसर ने उन्हें सीमांचल का मसीहा बताया और कहा कि तस्लीम साहब की यादें मिटा देने की कोशिशें होंगी, लिहाजा हमें ऐसा किसी हाल में नहीं होने देना है.

इस अवसर पर जमीयत उलेमा बिहार के प्रमुख हुस्न अहमद कादरी ने कहा कि 74 साल की जिंदगी में तस्लीमुद्दीन ने जो कारनामा अंजाम दिया है उसे सहेजना, नई नस्ल के लिए बड़ी चुनौती है.

नौकरशाही डॉट कॉम के एडिटर इर्शादुल हक ने इस अवसर पर जोर दिया कि तस्लीमुद्दीन साहब के सियासी योगदान पर एक शोध होना चाहिए और उन पर पुस्तक लिखी जानी चाहिए ताकि उनके योगदान को नई नस्ल तक पहुंचाया जा सके.

कार्यक्रम में प्रस्ताव पारित कर बिहार सरकार से मांग की गयी कि पटना स्थित हज भवन का नाम तस्लीमुद्दीन साहब के नाम पर रखा जाये. यह प्रस्ताव जनता दल यू के विधायक सरफराज आलम के द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सौंपा गया. इस प्रस्ताव में यह भी मांग की गयी कि राज्य सरकार तस्लीमुद्दीन की जयंती को सरकारी तौर पर मनाये जाने की घोषणा करे.

गौरतलब है कि भवन निर्माण मंत्री के रूप में तस्लीमुद्दीन ने ही हज भवन को खुद अपनी देख-रेख में बनवना शुरू किया था. याद रहे कि अररिया से राजद के सांसद तस्लीमुद्दीन का देहांत 17 सितम्बर को चेन्नई के एक अस्पताल में हो गया था.

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