दंगाई सुदर्शन न्यूज़ ने ऐसा क्या ज़हर उगला की हुआ बवाल

दंगाई पत्रकार सुरेश चाह्वान्के (Suresh Chavhanke) की गिरफ़्तारी की मांग उठ रही रही है। वह मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हुए नौकरशाही जिहाद नाम से सुदर्शन न्यूज़ टीवी पर एक सीरीज चला रहे हैं।

टीवी शो होस्ट तहसीन पूनावाला (Tehseen Poonawalla) ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को लिखे पत्र में सुरेश चव्हाणके के खिलाफ कानूनी कार्यवाई की मांग उठाते हुए कहा है की यह “धार्मिक हिंसा भड़काने के उद्देश्य से किया गया है”.

भारत में मुसलमानो की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 15 % है जबकि प्रतिष्ठित सिविल सेवाओं में मुसलमानो का प्रतिनिधित्व सिर्फ 3.25 % है। इसके बावजूद यह पत्रकार अपने चैनल पर “नौकरशाही में मुसलमानो की घुसपैठ” नमक एक प्रोग्राम चला रहे है जिस पर कोहराम मचा हुआ है।

बता दें की आईपीएस एसोसिएशन ने इसपर कड़ा रुख अपनाते हुआ कहा की “सुदर्शन टीवी द्वारा धर्म के आधार पर सिविल सेवाओं में उम्मीदवारों को टारगेट करने वाली एक समाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है। हम इस प्रकार के सांप्रदायिक और गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता की निंदा करते हैं”।

मामले पर राजनीती गर्माते देख उन्हें सफाई देनी पड़ी। बाद में अपनी सफाई देते हुए सुरेश चव्हाणके ने कहा की “हम वर्तमान में कार्यरत IAS /IPS अधिकारियों के विरुद्ध नहीं बोल रहे हैं.. हम नियुक्ति प्रक्रिया में भेदभाव और षड्यंत्र पर प्रश्न उठा रहे हैं”.

इधर जामिआ टीचर्स एसोसिएशन (Jamia Teachers’ Association) ने जामिआ यूनिवर्सिटी से अनुरोध किया है की सुरेश चव्हाणके के खिलाफ मानहानि का मुकदमा (Criminal Defamation Suit) दायर करे.
जामिआ टीचर्स एसोसिएशन ने साफ़ कहा है की सुरेश चव्हाणके अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किये गए वीडियो में यूपीएससी (Union Public Service Commission ) द्वारा चयन प्रक्रिया पर अत्यधिक आपत्तिजनक शब्दों में आरोप लगा रहे है

एसोसिएशन के अनुसार यह भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में मुसलमानों की भर्ती को टारगेट करता है और उनके लिए “जिहादी” शब्द का इस्तेमाल किया है। जामिया की आवासीय कोचिंग अकादमी को खराब रोशनी में खींचते हुए, सुरेश चव्हाणके ने जामिया से चुने गए भारतीय अधिकारियों को “जामिया के जिहादी” कहा। सुदर्शन न्यूज के उक्त सीएमडी द्वारा कई अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो खुले तौर पर उकसाते हैं, साथी नागरिकों के खिलाफ जहर उगलते हैं और भारत के लोगों को विभाजित करने की कोशिश करते हैं।

याद दिला दें की UPSC द्वारा सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2019 के परिणाम हाल ही में जारी किए गए। कुल 829 उम्मीदवारों ने इस प्रितिष्ठित परीक्षा पास की है जिनमें से 42 मुस्लिम हैं। पिछले साल कुल 28 मुस्लिम उम्मीदवार सिविल सेवाओं में चयनित हुए थे।
अगर पिछले वर्ष से इस वर्ष की तुलना करे तो इस बार कुल 829 उम्मदवारो में से 42 मुस्लिम उम्मीदवार चयनित हुए जो कुल उम्मदवारो का 5% है। पिछले साल चुने गए मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या 28 थी यह भर्ती किए गए 759 उम्मीदवारों में का 4 प्रतिशत था ।
2020 सिविल सेवा परिणाम में सफना नाज़ुद्दीन मुस्लिम उम्मदवारो में अव्वल रही है उन्हें 45 वा स्थान मिला है। जो पिछले वर्ष 28 चयनों से बढ़ी हैं। 2016 के बैच में यह था कि 50 उम्मीदवारों ने मुस्लिम समुदाय से सूची में जगह बनाई थी।

ज़कात फाउंडेशन के ज़फ़र महमूद यूपीएससी परीक्षा के लिए उम्मीदवारों को पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा की “2016 के बाद से, मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रतिशत लगभग 5 प्रतिशत रहा है जो एक बड़ी उपलब्धि है यह देखते हुए कि, आजादी के बाद से यह संख्या लगभग 2.5 प्रतिशत थी।”

सच्चर समिति का प्रभाव
गौरतलब है की केंद्र सरकार द्वारा गठित सच्चर समिति की रिपोर्ट में मुसलमानो की सरकारी नौकरियों में ख़राब प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई गयी थी. जिससे मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय सुझाये गए थे।

रिपोर्ट के अनुसार उस समय केवल 3 प्रतिशत मुस्लिम आईएएस अधिकारी, 4 % मुस्लिम आईपीएस अधिकारी और लगभग 2 % मुस्लिम भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस ) में थे। अगर इसकी तुलना देश में कुल मुस्लिम आबादी से करे तो तस्वीर निराशाजनक थी। 2001 जनगणना के अनुसार भारत में मुसलमानो की कुल आबादी देश की कुल आबादी का 13. 4 % थी।

तब से मुस्लिम समुदाय में जाग्रति आयी है। जिसका नतीजा यह हुआ की 2020 के परीक्षा परिणामो में कुल मिलाकर 42 मुस्लिम उम्मीदवार चयनित हुए जो कुल चयनित उम्मदवारो का 5 % है।

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