तेजस्वी ने किया दिल दहला देनेवाला ट्विट, उफ, ये कैसे दिन!

तेजस्वी ने किया दिल दहला देनेवाला ट्विट, उफ, ये कैसे दिन!

थोड़ी देर पहले तेजस्वी यादव ने दिल दहला देनेवाले पांच ट्विट किए। कहा, जीवन में इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया। लोग तड़प रहे हैं, पर मदद नहीं कर पा रहा।

जहां केंद्र की सत्ता ने नेहरू, गांधी की आलोचना, पाकिस्तान, मंदिर-मस्जिद में न सिर्फ देश को उलझाए रखा, बल्कि खुद भी कोरोना से लड़ने की तैयारी से दूर रही। वहीं बिहार के सत्ताधारियों ने 15 वर्ष पहले की बात कर-करके न सिर्फ लोगों को उलझाए रखा, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने और आनेवाली सुनामी की आहट से भी अनभिज्ञ रही। इसका इतना बड़ा खामिया जनता को चुकाना पड़ रहा है।

परिस्थिति इतनी विकट हो गई है कि विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। उन्होंने ट्विट किया- इतना असहाय, असमर्थ कभी अनुभव नहीं किया। एक इंसान होने के नाते चाहकर भी गुहार लगा रहे, मदद मांग रहे, तड़प रहे ज़रूरतमंदों की मदद नहीं कर पा रहा। अस्पतालों में फोन लगवाओ तो जवाब आता है- कुछ नहीं कर सकते सर! बेड नहीं है। इंजेक्शन नहीं है, ऑक्सीजन नहीं है। कैसे मदद करें?

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अधिकारियों को फोन लगवाओ तो फोन बजता रह जाता है। कोई उठाता नहीं है। अधिकारी या तो सीएम की भी सुन नहीं रहे या मुख्यमंत्री को व्यवस्था दुरुस्त करने में कोई रुचि ही नहीं? कोई ऐसी dedicated हेल्पलाइन नहीं है जहां लोग फोन कर समय पर बेड, ऑक्सीजन या दवाओं की उपलब्धता की जानकारी ले पाएं।

नागरिकों के लिए एक तरफ बेपरवाह व भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था का अंधा कुआं है तो दूसरी तरफ काला बाज़ारी, मुनाफाखोरी और आंकड़ों की हेरा-फेरी। भ्रष्ट सरकार धृतराष्ट्र की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठी है। लोगों को मरते छोड़ सरकार बस हेड लाइन मैनेज करने व मौत के आंकड़ों को कम करने में लगी है।

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हमारी पार्टी और कार्यकर्ता लोगों की मदद कर रहे हैं, लेकिन एक सीमा के बाद ऑक्सिजन नहीं मिल पाती, अस्पतालों में बेड नहीं मिल पाते। हम सीमित संसाधनों के साथ लोगों की मदद करने के लिए आगे बढ़ते हैं तो हाथ ऊपर कर चुकी सरकार और उसकी भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था दीवार बनकर रास्ता रोक देती है।

हमने सर्वदलीय बैठक में सरकार को इस महामारी से निपटने के लिए 30 सकारात्मक सुझाव दिए थे पर एक पर भी अहंकारी सरकार ने अमल नहीं किया। नीतीश सरकार की आम लोगों की तकलीफ दूर करने की कोई मंशा ही नहीं है। सरकार बस विज्ञापन देकर और आँकड़ों को कम कर धूल झोंकने के फ़िराक में है।

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