राष्ट्रीय जनता दल का तेजस्वी युग: ना-हल्ला ना-हुडदंग अब सिर्फ शालीनता चलेगी

राष्ट्रीय जनता दल का तेजस्वी युग: ना-हल्ला ना-हुडदंग अब सिर्फ शालीनता चलेगी

तेजस्वी यादव . इमेज क्रेडिट – The Hindu

शाहबाज़ की इनसाइड पोलिटिकल स्टोरी

पार्टी का बाहरी स्वरुप कार्यकर्ता होते हैं. कार्यकर्ताओं की छवि का पार्टी के ऊपर असर होता है. 2018 के जून महीने में एससी-एसटी एक्ट के विरोध में भारत बंद का आयोजन था. पटना में राष्ट्रीय जनता दल (रजद) के कार्यकर्ताओं के द्वारा एक यात्री वाहन में लाठी से तोड़ फोड़ की गयी. इससे पहले की पार्टी की आलोचना होती, घटना पर तेजस्वी ने त्वरित कारवाई की.

उन्होंने ना सिर्फ दोषी कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाला बल्कि उस वाहन के चालक को खोजकर उसकी क्षतिपूर्ति करवाई. इससे यह सन्देश गया कि पार्टी के कार्यकर्ता अगर अनुशासित नहीं रहेंगे तो अंततः पार्टी की इमेज भी जाती रहेगी जो चुनावों में घातक सिद्ध हो सकती है.

दरअसल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के ऊपर लालू यादव के समय से ही कार्यकर्ताओं के असंयमित रहने, हो-हल्ला करने और हुडदंग मचाने के आरोप लगते रहे हैं. विरोधी राजद को “लाठी पीलावन” रैली को पार्टी की पहचान बताते हैं. कई बार पार्टी कार्यकर्ता लाठी लेकर सड़कों पर उतर जाते हैं जो अभी के समय के कॉस्मोपॉलिटन कल्चर में फिट नहीं बैठती. पार्टी की इस तरह की छवि को देखते हुए राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव इसे बदलने को आतुर हैं.

इस बार तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने नयी उंचाईयों को छुआ है. फिलहाल पार्टी के नाम में ‘राष्ट्रीय’ शब्द तो है लेकिन अपने इतिहास में यह ज्यदातर समय बिहार की क्षेत्रीय दल की भूमिका में रही. अब तेजस्वी बिहार के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम् भूमिका निभाना चाहते हैं जिसके लिए पार्टी का आंतरिक एवं बाहरी कायापलट ज़रूरी है.

बिहार चुनाव 2020 में स्पष्ट बहुमत मिलने से राजद (RJD) में तेजस्वी युग की औपचारिक शुरुआत हो जाएगी. अब आगे आने वाले समय की कठिन चुनौतियों को देखते हुए तेजस्वी अपने पिता द्वारा स्थापित जनता दल को फिर से ‘राष्ट्रीय’ बनाना चाहते हैं. तेजस्वी पार्टी की नयी छवि बनाने के लिए आंतरिक एवं बाहरी स्वरुप में कायापलट की और इशारा कर रहे हैं. जिसके लिए कार्यकर्ता स्तर से लेकर पार्टी पदाधिकारियों तक सबका निष्ठा के साथ-साथ अनुशासित, नियमित और संयमित रहना और दिखना ज़रूरी है.

लालू प्रसाद यादव ने 5 जुलाई 1997 को जनता दल के विघटन के बाद एक नयी पार्टी का गठन किया किया था. उन्होंने पार्टी का नाम ‘राष्ट्रीय जनता दल’ रखा. पार्टी ने मंडल कमीशन द्वारा दिए गए प्लेटफार्म को भुनाया और सोशलिज्म एवं सेकुलरिज्म के गलियारों से आगे बढ़ते हुए बिहार में सियासत के नए समीकरण गढ़े. वर्ष 2008 में पार्टी द्वारा भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में किये गए अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का दर्जा मिला.

लेकिन 30 जुलाई 2010 को RJD का राष्ट्रीय दर्जा जाता रहा. पार्टी के 23 सालों के इतिहास में सिर्फ 2 वर्षो के लिए राजद एक राष्ट्रीय दर्जे की पार्टी थी. अभी इस समय राष्ट्रीय जनता दल सिर्फ बिहार की क्षेत्रीय पार्टी है और बिहार के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी केंद्रीय भूमिका निभाना चाहती है.

तेजस्वी की राष्ट्रीय जनता दल के कायापलट करने की इच्छा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बिहार चुनाव 2020 में एग्जिट पोल के नतीजों में प्रचंड बहुमत की सम्भावना को जानते हुए भी पार्टी ने कार्यकर्ताओं को ना सिर्फ संयमित रहने का निर्देश दिया है बल्कि राजनीतिक विरोधियों के साथ भी अनुचित व्यवहार से बचने की सलाह दी है. ऐसा इसलिए क्यूंकि तेजस्वी यह जानते हैं की आगे लड़ाई लम्बी है और विरोधी उनकी पार्टी की हल्की गलती का भी बड़ा खाम्यज़ा देने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

बिहार चुनाव में अपने प्रति लोगों का स्नेह देखकर तेजस्वी यादव अपनी और अपनी पार्टी की छवि को लेकर और ज़यादा सजग हैं. अगर उनके जन्मदिन की बात करें तो पिछले साल उन्होंने एक चार्टर्ड प्लेन में अपना जन्मदिन मनाया था. जबकि इस बार उन्होंने इसे सादगी से मानाने का निर्णय लिया है.

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के आधिकारिक हैंडल से ट्वीट किया गया.

इसके आलावा तेजस्वी के चुनावी कैंपेन को ध्यान से देखें तो उनकी लम्बी रणनीति का पता चलता है. उन्होंने 250 से ज्यादा जनसभाएं की लेकिन एक बार भी नीतीश कुमार पर व्यक्तिगत टिपण्णी नहीं की. वह स्वयं कहते भी हैं कि मुझे लम्बी राजनीति करनी है झूठ नहीं बोलेंगे.

राष्ट्रीय जनता दल के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय के मकसद को हासिल करने के रास्ते में भाजपा को सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर देखा. उन्होंने भाजपा को ‘कमंडल’ की संज्ञा दी. भाजपा ने बिहार में लालू राज को ‘जंगलराज’ की संज्ञा दी. दोनों के बीच राजनीतिक दुशमनी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लालू कई टीवी इंटरव्यू में मछलियों को खाना देते समय उनसे भाजपा को भगाने के लिए कहते दिखे.

लालू के बेटे तेजस्वी ने अपने पिता के सामाजिक न्याय की लड़ाई को नया विस्तार देते हुए आर्थिक न्याय को अपना राजनीतिक मकसद बनाया. उनके सामने भी भाजपा सबसे बड़ी राजनीतिक दुश्मन बन कर उभरी है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तेजस्वी को “जंगलराज के युवराज” की संज्ञा देकर सामने कौन है यह दिखाने की कोशिश की. क्यूंकि भाजपा शोषितों की राजनीति को अलग नज़रिए से देखती है.

तेजस्वी द्वारा प्रधानमंत्री के शब्दों का जवाब न देने में भी इशारे हैं. तेजस्वी पहले पूर्ण रूप से तैयार हो जाना चाहते हैं. इसके लिए वह राष्ट्रीय जनता दल के आंतरिक एवं बाहरी स्वरुप में बदलाव की और इशारा कर रहे हैं एवं इसकी और अग्रसर हैं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके पिता द्वारा स्थापित RJD तेजस्वी युग में खुद को कैसे ढाल पाती है.

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