Upendra Kushwaha आखिर चाहते क्या हैं? इन चार प्वाइंट्स से समझें

पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से Upendra Kushwaha ने एनडीए में  जिस तरह की आंखमिचोनी  के खेल में लगे हैं. आखिर उसके अंदर का खेल क्या है.

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Irshadul Haque, Editor Naukarshahi.com

पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से Upendra Kushwaha ने एनडीए में  जिस तरह की आंखमिचोनी  के खेल में लगे हैं. आखिर उसके अंदर का खेल क्या है.

खीर से ले कर दस्तरख्वान तक. भाजपा के खिलाफ कभी कड़क, कभी नरम तो कभी कंफ्युजन वाले बयान तक. कभी नीतीश सरकार के खिलाफ हल्लाबोल तो कभी शर्तों की बौछार तक.कभी एनडीए के धुर विरोधी तेजस्वी के संग चाय की चुस्की और उसे संयोग की मुलाकात बता देने तक. पिछले कुछ महीनों से आरएलएसपी नेता उपेंद्र कुशवाहा की यह गडमड नीति कइयों को कंफ्यूज किये हुई है. कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर उपेंद्र कुशवाहा ने ऐसा कंफ्युजन क्यों क्रियेट कर रखा है?

जाहिरी तौर पर कुशवहा को दो में से एक फैसला लेना है. यह कि उन्हें एनडीए में बने रहना है या एनडीए छोड़ना है. लेकिन आखिर क्या बात है कि कुशवाहा इस मामले को लमराते जा रहे हैं? आज उन्होंने बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस की तो कुछ लोगों को उम्मीद थी कि वह कोई बड़ा फैसला लेंगे. पर फिर वही ढाक के तीन पात. उन्होंने अपने आक्रमण की धार को और तीखा किया और नीतीश कुमार की सरकार को फिर लपेटे में लिया.

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वह बिहार में शिक्षा की कथित बदहाली को इश्यु बनाये हुए हैं. इसी तरह उन्होंने दूसरी जो महत्पूर्ण बात कही वह थी कि उन्होंने एक तरह से घोषणा कर दी कि फिल्वक्त वह खुद से मंत्रिमंडल से नहीं हटने वाले. उन्हें पीएम मोदी खुद हटायेंगे तब तक बने रहेंगे. उनकी इस रणनीति को समझने के लिए कुछ पहलुओं पर ध्यान देना होगा.

 

  1. शहीद होना चाहते हैं कुशवहा

दर असल कुशवाहा की रणनीति है कि एनडीए उन्हें धक्के दे कर बाहर करे. वह अपने वोटरों को यह समझा सकें कि वह तो एनडीए में रहना चाहते थे लेकिन उन्होंने जब पब्लिक से जुडी समस्याओं पर सवाल उठाये तो उन्हें बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया. दर असल कुशवाहा जिस वोटर समूह को रिप्रेजेंट करते हैं उसका एक हिस्सा भाजपा और एक हिस्सा जदयू का समर्थक भी है. वह एनडीए छोड़ने से पहले उन वोटरों की सहानुभूति गेन करना चाहते हैं. उनकी इस रणनीति का ही हिस्सा है कि ‘कुशवाहा समाज’ के लोगों को पिछले दिनों पुलिस ने लाठियों से जब हमला किया तो उन्होंने इसको खूब भुनाया.

 

2. नीच बयान को तूल देने का मकसद

 

नीतीश कुमार ने एक कार्यक्रम में एक पत्रकार के सवाल पर जवाब दिया था कि इतना नीचे मत जाइए. दर असल नीतीश का यह सवाल इस बात से जुड़ा था कि वह कार्यक्रम विकास को ले कर आयोजित था. लेकिन एंकर ने उसमें राजनीति को भी लपेट लिया. खैर इस बयान में चूंकि कुशवाहा का जिक्र था तो उन्होंने इस इश्यु को दबोच लिया और कहा कि मुख्यमंत्री मुझे नीच समझते हैं. कुशवहा की यहां भी वही रणनीति थी कि वह अपने वोटर समूह को नीतीश के खिलाफ खड़ा करें और उनकी सहानुभूति लें.

3 नीतीश से बैर

जानने वालों को पता है कि एक समय नीतीश के सिपहसालार रहे कुशवाहा को अपनी पार्टी से बाहर किया था. आरोप लगाने वाले तो यह भी कहते हैं कि सरकारी आवास से नीतीश के इशारे पर ही कुशवाहा को अचानक सड़क पर आना पड़ा था. यहां तक कि कुशवाहा की तमाम राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के पर कतरने के आरोप भी लोग नीतीश पर धरते हैं. पिछले वर्ष जब नीतीश एनडीए में वापस आये और अपनी सरकार का विस्तार किया तो कुशवाहा की पार्टी से किसी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया. कुशवाहा समर्थक आरोप लगाते हैं कि नीतीश कुशवाहा की पार्टी का विस्तार खुद के नुकसान की कीमत पर होते नहीं देखना चाहते. लिहाजा कुशवाहा भी अपने समर्थकों में यह मैसेज देना चाहते हैं कि कुशवाहा समाज के खिलाफ नीतीश किसी भी हद तक जा सकते हैं. कुशावाहा यह मैसेज जोरदार तरीके से देना चाहते हैं. ऐसा करके वह समझते हैं कि नीतीश के प्रति कुशवहा समाज में नाराजगी बढ़े.

4 भाजपा में रहते हुए सेक्युलर वोट की चिंता

उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में जरूर रहे है. लेकिन साम्प्रदायिक मुद्दों पर उनका स्टैंड  मजबूती से इन मुद्दों के खिलाफ रहा है. लेकिन यह भी सच है कि एनडीए में रहने के कारण उन्हें भाजपा समर्थकों का खूब वोट मिला. कुशाहा की चिंता उन वोटों की भी है. वह चाहते हैं कि वैसे वोटर उनके खिलाफ नाराज ना हों. लिहाजा वह अभी तक गेंद भाजपा के शीर्ष नेताओं के पाले में फेकने में लगे हैं.

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उधर एनडीए चाहता है कि ऐसी परिस्थिति बने कि कुशवाहा खुद एनडीए छोड़ के चले जायें. लेकिन कुशवाहा की रणनीति है कि पहल एनडीए की तरफ से हो. वैसे आरएलएसपी के अंदरखाने से जो खबरें आती रही हैं उससे यह तय सा लगता है कि कुशवहा देर सबेर एनडीए छोड़ेंगे. बस वह मुनासिब समय क्या होगा. इसी का इंताजार है.

 

 

 

 

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