आइंस्टीन को चुनौती दे कर विख्यात हुए Vashishtha Narayan नहीं रहे, जानिए उनके जीवन की कहानी

 आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती दे कर पूरी दुनिया में ख्याति पाने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हो गया है. बिहार के इस महान व्यक्तित्व के बारे में जानिये.

 

भोजपुर जिले के वसंतपुर गांव में जन्मे  वशिष्ठ नारायण सिंह ने आइंस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी। आइंस्टिन के सिद्धांत E=MC2 को चैलेंज किया था उन्होंने मैथ में रेयरेस्ट जीनियस कहा जाने वाला गौस की थ्योरी को भी उन्होंने चैलेंज किया था। यहीं से उनकी प्रतिभा का लोहा दुनिया ने मानना शुरू किया था।

 

लेकिन, उनके जवानी में ही हुई सीजोफ्रेनिया नामक बीमारी के कारण पिछले दो दशक से वह गुमनामी में जी रहे थे. आज यानी 14 नवम्बर को उनका देहांत पीएमसीएच में हो गया. हाला ही में कुछ लोगों ने उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी की थी. उनके निधन पर मुख्मंत्री ने गहरी संवेदना व्यक्त की और उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान के साथ करने का ऐलान किया.

 

वशिष्ठ ने नेतरहाट विद्यालय से मैट्रिक किया। वह संयुक्त बिहार में टॉपर रहे थे। वशिष्ठ जब पटना साइंस कॉलेज में पढे. उसके बाद  1965 में वशिष्ठ अमेरिका चले गये 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बने। 1971 में भारत लौट आए। उन्होंने आईआईटी कानपुर, आईआईटी मुंबई, और आईएसआई कोलकाता में काम किया।

कम्प्युटर जैसा दिमाग

जब वे नासा में काम करते थे तब अपोलो (अंतरिक्ष यान) की लॉन्चिंग से पहले 31 कम्प्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए। इस दौरान उन्होंने पेन और पेंसिल से ही कैलकुलेशन करना शुरू किया। जब कम्प्यूटर ठीक हुआ तो उनका और कम्प्यूटर्स का कैलकुलेशन बराबर था।

 

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