43 विधायकों वाले नीतीश 74 विधायकों वाली BJP पर भारी क्यों

43 विधायकों वाले नीतीश 74 विधायकों वाली BJP पर भारी क्यों

पिछले महीने 24 दिसंबर को बिहार के दोनों उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिले, तो उन्होंने कहा था कि आप दोनों बिहार में भाजपा का चेहरा हैं। बिहार की जनता ने भाजपा पर भरोसा किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो प्रधानमंत्री ने कही वह यह कि बिहार के विकास कार्यो में भाजपा दिखनी चाहिए। प्रधानमंत्री की यह इच्छा स्वाभाविक है, क्योंकि भाजपा की सीटें जदयू से बहुत ज्यादा हैं।

कुमार आनिल

कई राजनीतिक एक्सपर्ट यह मानकर चल रहे थे कि इस बार भले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों, पर वे पहले की तरह बड़े भाई की भूमिका में नहीं रह पाएंगे। भाजपा ने जब दो उपमुख्यमंती बनाए, तो ऐेसे कयासों को और भी बल मिला। अगर पिछले दो हफ्ते के अखबारों के पहले पन्ने पर नजर डालें, तो पीएम की इच्छा पूरी होती नजर नहीं आती। पहले पन्ने पर मुख्यतः सीएम नीतीश कुमार ही नजर आते हैं। आज भी बड़े भाई की भूमिका में वे ही दिखते हैं।

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आखिर बिहार में भाजपा के पास अधिक विधायक होने के बावजूद वह क्यों पिछड़ती दिख रही है। इसकी तीन वजहें हैं। पहला, भले ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट काफी ताकतवर माना जाता है, पर बिहार में वह इस मामले में कमजोर है। दूसरी वजह है जन संपर्क एवं सूचना विभाग जदयू के पास होना और अंतिम, लेकिन महत्वपूर्ण कारण है राजनीतिक हस्तक्षेप और राज्य में सुशासन और विकास के लिए वैकल्पिक दृष्टि और पहल का अभाव।

हाल की बात है। कोरोना टीकाकरण के लिए सीएम ने एनएमसीएच का दौरा किया। साथ में भाजपा के स्वास्थ्य मंत्री भी थे। उसी दिन सीएम ने गृह विभाग की समीक्षा बैठक भी रख दी गयी। और सरकारी विज्ञ्पति में गृह विभाग की बैठक की विस्तृत जानकारी प्रेस को दी गई। मंगल पांडेय से जुड़ी खबर काफी महत्वपूर्ण होने के बावजूद वह अंदर के पन्नों में सिमट गयी. स्वाभाविक तौर पर उसे प्रेस ने ज्यादा महत्व और स्थान दिया। कोरोना टीकाकरण की तैयारी भी महत्वपूर्ण खबर थी, लेकिन उसे संक्षिप्त रूप में जारी किया गया।

बिहार में सूचना एवं जन संपर्क विभाग शुरू से जदयू के पास रहा है। इस कारण भी भाजपा अधिक विधायकों के बावजूद दूसरे नंबर की साझीदार ही लगती है। थोड़े समय के लिए जब जदयू और राजद की सरकार थी, तब भी जन संपर्क विभाग जदयू के पास ही था।

तीसरी बात यह कि केंद्र में अपनी सरकार होने के बावजूद बिहार भाजपा केंद्र से सूबे के लिए कोई ऐसी योजना लाने में विफल रही है, जो उसे जदयू पर बढ़त बनाने में मदद कर सके। पटना विवि को केंद्रीय विवि का दर्जा देना हो, किसी बड़े निवेश के साथ रोजगार के अवसर विकसित करने में भी वह अलग से कुछ करती नहीं दिख रही है। किसानों ने धान की फसल अक्टूबर में ही काट ली, पर उसकी खरीद दो महीने बाद भी ठीक से नहीं हो पा रही। साथ ही जदयू के रहते लव जिहाद जैसे मुद्दे वह नहीं उठा सकती। अब देखना है कि पीएम की इच्छा पूरी करने के लिए भाजपा कब और कैसे पहल करती है।

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