कन्हैया की हार:भूमिहारों ने जातिवाद को नकारा, सम्प्रदायवाद को अपनाया, मुसलमानों ने क्या किया?

कन्हैया की हार:भूमिहारों ने जातिवाद को नकारा, सम्प्रदायवाद को अपनाया

  कन्हैया के कारण पूरे देश में सबसे हॉट सीट बन चुके बेगूसराय के चुनाव नतीजे यह संकेत करते हैं कि भूमिहारों ने जातिवाद को सिरे से नकार दिया है लेकिन सम्प्रदायवाद को अपना लिया. वहीं मुसलमानों के बड़े वर्ग ने तन्वीर हसन को रिजेक्ट कर कन्हैया को सपोर्ट करके मुस्लिम सम्प्रदायवाद को नकारा है.

Irshadul Haque

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

कुछ लोग कन्हैया कुमार के लिए तन्वीर हसन को चुनावी मैदान से हट जाने की वकालत कर रहे थे. वैसे लोग यह जान कर अपने दांतो तले उंगलिया दबा लेंगे कि कन्हैया और तन्वीर को पड़े तमाम वोट भी अगर एक जगह कर दिये जाते तो भी गिरिराज सिंह को हराया नहीं जा सकता था.

 

नौकरशाही डॉट कॉम ने बेगूसराय लोकसभा के उम्मीदवारों को पड़े वोट का अध्ययन किया है. इस अध्ययन में पाया गया है कि गिरिराज सिंह को बम्पर वोट पड़े हैं.

उन्हें छह लाख बान्वे हजार एक सौ तिरान्वे ( 692193) वोट पड़े. यह कुल पड़े वोट का 56.48 है.

 

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किसको कितने वोट

इसी तरह सीपीआई प्रत्याशी कन्हैया कुमार को कुल दो लाख उन्हत्तर हजार नौ सौ छियत्तर  (269976) मिले. कन्हैया को कुल  22.3 प्रतिशत वोट मिले.

इसी तरह राजद के प्रत्याशी तन्वीर हसन को कुल एक लाख अठान्वे हजार दो सै तेतीस ( 198233) वोट मिले. तन्वीर को कुल वोटों का 16.17 प्रतिशत वोट आये.

इस तरह तन्वीर हसन और कन्हैया कुमार के तमाम वोटों को एक साथ जोड़ दिया जाये तो ये चार लाख अड़सठ हजार दो सौ नौ ( 468,209) वोट होते हैं. जो कि  भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह को पड़े कुल 692193 से   दो लाख 23 हजार 984 वोट ज्यादा है( 223984).

इस आंकड़े को देखने से यह पता चलता है कि कन्हैया और तन्वीर  हसन के तमाम वोट एक जगह कर देने पर भी गिरिराज सिंह की जीत को रोक पाना असंभव था.

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कन्हैया कुमार की हार ने एक बात और साबित कर दी है कि क्राउड पूलिंग शख्सियत, अच्छी भाषण कला और मजबूत तर्क शक्ति के बल पर ख्याति तो प्राप्त की जा सकती है पर वोट नहीं.

 

कन्हैया की हार से मिले कुछ सबक

कन्हैया कुमार की शर्मनाक हार के विश्लेषण का एक और महत्वपूर्ण पहलू है. कन्हैया की लोकप्रियता राष्ट्र्व्यापी थी. जिसके कारण सोशल मीडिया पर कन्हैया तो छाये हुए थे लेकिन बेगूसराय की जनता, जो वोटर थी उनके पास कन्हैया की शख्सियत से ज्यादा महत्वपूर्ण  मोदी द्वारा राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाये गये मुद्दे थे.

हम यह शुरू से मानते रहे कि कन्हैया कुमार की लोकप्रियता जिस सेकशन में है वो सेक्शन कन्हैया का वोटर ही नहीं है. जिस कारण मीडिया को कन्हैया के कारण खूब टीआरपी तो मिला पर उस मीडियाई सुर्खियों का कोई लाभ कन्हैया को नहीं मिल सका.

कन्हैया की हार का एक और खास विश्लेषण हमें इस नतीजे पर पहुंचाता है कि बेगूसराय में  पांच लाख के करीब भूमिहार मतदाता ( ऐसा दावा किया जाता है) हैं. और तीन लाख के करीब मुसलमान मतदाता हैं. जिस तरह से भाजपा के गिरिराज सिंह को छह लाख से ज्यादा वोट पड़े हैं उससे साफ लगता है कि कन्हैया को भूमिहारों ने बुरी तरह से रिजेक्ट कर दिया है. मतलब साफ है कि उदारवादी भूमिहार कन्हैया को कट्टरवादी भूमिहारों ने बुरी तरह से खारिज कर दिया.

 

मुसलमानों ने तो तन्वीर हसन से ज्यादा वोट कन्हैया को दे दिया लेकिन खुद भूमिहारों ने कन्हैया को नकार कर साबित कर दिया कि भूमिहारों में जातिवाद से ज्यादा साम्प्रदायवाद हावी है.

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