महाशक्ति अमेरिका अफगानिस्तान में शर्मनाक हार का शिकार क्यों हुआ

महाशक्ति अमेरिका अफगानिस्तान में शर्मनाक हार का शिकार क्यों हुआ

महाशक्ति अमेरिका अफगानिस्तान में 21 सदी की सबसे शर्मनाक हार ( super power America looses war in Afghanistan) झेल कर तालिबान की 31 अगस्त को देश से निकलने की धमकी के आगे झुक चुका है.

महाशक्ति अमेरिका अफगानिस्तान में शर्मनाक हार का शिकार क्यों हुआ

अमेरिकी कमांडर जेनेरल केनेथ मैकेंजी ने बयान देते हुए कहा है कि “मैं अब सौ फीसदी यकीन के साथ कह सकता हूँ कि अमेरिकी आर्म्ड फोर्सेज का हर सदस्य अफगानिस्तान से बाहर आ चुका है”।

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Irshadul Haque

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के ताकतवर कमांडर की 21वीं सदी की सबसे भयावह हार का प्रतीकात्मक वाक्य यही है। जिस अमेरिका को यह गुमान था कि वह अजेय है, आज वह 31 अगस्त की तालिबानी समय सीमा के एक दिन पहले यह घोषणा करने पर मजबूर है कि लो आपकी समय सीमा के पहले हमने आपके देश को खाली कर दिया है।

आप ताक़लीबान की नीवतियों के समर्थक या आलोचक हो सकते हैं लेकिन आपको यह सत्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आज अमेरिका तालिबान के सामने शर्मनाक हार स्वीकार ही नहीं कर चुका है बल्कि अफगानिस्तान से भाग चुका है। वो भी दिन के उजाले में नहीं, बल्कि रात के अंधेरे में। यह घटना जुलाई के अंतिम सप्ताह की है जब काबुल एअरपोर्ट की रोशनी बुझा कर अंधेर में अमेरिकी फौज का जत्था भाग निकला था।

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सवाल यह है कि विश्व की माह शक्ति एक ऐसे हथियारबंद लड़ाके के सामने हार कर भाग गई जिसे वह आतंकवादी गिरोह घोषित करता आया है। 20 सालों की लंबी लड़ाई में जिसे वह निस्त नाबूद करने का प्रण ले चुका था, ऐसा क्या हुआ कि उस फिसिद्दी गिरोह से हार कर भाग गया।

दरअसल अफगानिस्तान का हर दूसरा व्यक्ति खुद दूसरे अफगानिस्तानी का दुश्मन है। लेकिन अफगानिस्तानी को एक करने वाला जो धागा है वह है विदेशी आक्रमण। अफगानी को यह बर्दाश्त नहीं कि कोई बाहरी उनपर राज करे। 1979 में सोवियत रूस ने अफगानिस्तान पर हुकूमत किया। लेकिन रूस को आखिरकार वहां से 1989 में भागना पड़ा।

सौवियत रूस से नहीं लिया सबक

पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के प्रमुख रहे हमीद गुल का एक रोचक कथन है। वह कहते हैं कि ” हमने अमेरिका की मदद से रूसियों को अफगानिस्तान से बाहर किया था। और अब अमेरिका की मदद से अमेरिकियों को बाहर निकाल दिया “

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अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस की नाकामी से कोई सबक नहीं लिया। नतीजा सामने है। इसके अलावा अमेरिका ने अफगानिस्तान में 20 सालों में उतनी दौलत पानी की तरह बहा दिया जितनी भारत का एक साल का बजट है। अफगानिस्तान में अमेरिका ने न सिर्फ एक हज़ार से ज़्यादा सैनिकों की जान गवाईं बल्कि आर्थिक व सामरिक मोर्चे पर भी बहुत कुछ गवां दिया। तभी तो राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले दिनों कहा था कि ” हम अपने बच्चों को जान गवाने के लिए अनंत काल तक अफगानिस्तान में नहीं छोड़ सकते”.

आगे क्या

अमेरिका की अफगानिस्तान में उस अपराधी की हालत हो गई है जो सज़ा के तौर पर 100 कोड़े भी खाता है और 100 प्याज़ भी।

अब आगे के जो हालात बन रहे हैं उससे लगने लगा है कि आतंकी संगठन तालिबान को अमेरिका एस्टेट इन्टीटी मानने को मजबूर होता दिख रहा है। ब्रिटेन तो यहां तक कह चुका है कि अफगानिस्तान की ज़मीन पर आतंकवाद न फले-फुले यह सुनिश्चित करने के लिए हमें तालिबान से बात करनी होगी।

चीन भी यह दुहराता रहा है कि तालिबान को यह विश्वास दिलाना होगा कि उसकी धरती पर चीन के उघियार मुस्लिमों के पक्ष में कोई हिंसक गतिविधि न शुरू हो। दुनिया के ताकतवर देशों की ये बदली हुई भाषा इशारा करती है कि तालिबान को आतंकी के बजाय वे एस्टेट प्लेयर मानने को तैयार हैं।

इधर भारत को सबसे ज़्यादा सचेत रहने की ज़रूरत है। क्योंकि तालिबान का फिरसे सत्ता में आने पर पाकिस्तान अपर हैंड हो चुका है। पाकिस्तान, भारत में अशांति फैलाने का दुस्साहस कर सकता है। उसकी कोशिश होगी कि वह तालिबानियों का इस्तेमाल कश्मीर में आतंकवाद फैलाने में इस्तेमाल करे।

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