Youtube के बाजार में ‘गोवार व भूमिहार’ की रफ्तार सुपरफास्ट 

हम पिछले साल जून महीने में बीवाईएन बिहार के नाम से यूट्यूब चैनल लेकर आये थे। लेकिन लंबा नहीं खींच पाये। बीच में भी प्रयास किया, यह कोशिश भी‍ विफल हुई। तीसरा प्रयास हमने फिर शुरू किया है।

 वीरेंद्र यादव 

इस दौरान हमने पटना से संचालित हो रहे कई यूट्यूब चैनलों की खबर, विषय और व्यक्ति को लेकर अध्ययन किया। उन खबरों के व्यूज की संख्या को भी देखा। इस अध्ययन में एक बात सामने आयी कि Youtube का बाजार भी जातियों से प्रभावित है।

यादव और भूमिहार नेताओं से जुड़ी खबरें खूब देखी जा‍ती हैं, जबकि अन्य जातियों के नेताओं के व्यूज की संख्या इन दोनों जातियों की तुलना में काफी कम होती है। खबर, एंगल और विषय के चयन में चैनल और पार्टी के बीच का ‘अर्थशास्त्र’ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन व्यूज की संख्या खबरों से जुड़े नेताओं की जाति से प्रभावित होती है।


लालू यादव, तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव, गिरिराज सिंह, अनंत सिंह, कन्हैया कुमार आदि नेताओं से जुड़ी खबरें खूब देखी जा रही हैं। व्यूज की संख्या 50 हजार से अधिक लांघने वाली खबरें इन्हीं नेताओं से जुड़ी मिल जाएगी। एकाध अन्य नेताओं की खबर आपको मिल जाएगी, जो 50 हजार के पार कर जाती हैं।

लेकिन ऐसी खबरों के केंद्र में कहीं-न-कहीं यादव या भूमिहार ही होते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से जुड़ी खबरें Youtube के बाजार में पिछड़ जा रही हैं। सुशील मोदी की खबरें वही रफ्तार पकड़ती हैं, जो लालू यादव या तेजस्वी यादव से जुड़ी होती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी बिहार के दौरे पर आ रहे हैं, लेकिन इनकी खबरों को भी रफ्तार नहीं मिल पाती है। खबरों को रफ्तार पकड़ने के लिए यादव व भूमिहार का ‘डबल इंजन’ जरूरी है।


दरअसल बिहार के समाज में और सामाजिक सत्ता संघर्ष में यादव व भूमिहारों का आपसी टकराव चर्चा में रहा है। इसकी अभिव्यक्ति सोशल मीडिया में भी हो रही है। इसका प्रभाव यूट्यूब पर भी दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि व्यूअर्स में इन्हीं दो जातियों के लोग हैं। व्यूअर्स सभी जाति-धर्म के लोग हैं, लेकिन उन्हें भी शायद इन्हीं दो जातियों की खबरें पसंद आती हैं। यही कारण है कि यादव-भूमिहार नेताओं से जुड़ी खबरों की रफ्तार सुपरफास्ट होती है, जबकि अन्य जातियों के नेताओं से जुड़ी खबरों को दौड़ने में दम फूलने लगता है।

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