यह चेन्नई की मक्का मस्जिद है. यह मस्जिद अपनी नजीर आप है क्योंकि यहां अल्लाहो अकबर की सदाओं के अलावा आईएएस बनाने की कोशिशें की गूंज भी सुनी जा स कती है.

मक्का मस्जिद में आईएएस की तैयारी
मक्का मस्जिद में आईएएस की तैयारी

जेएस डेनियल स्टालिन

आप जैसे ही अन्ना सलाई रोड स्थित इस मस्जिद की सीढ़ियों से हो कर मस्जिद में प्रवेश करते हैं आप देखते हैं कि यहां 40 युवाओं का एक समूह सिविल सर्विसेज की परीक्षा से जुड़ी पुस्तकों में तल्लीन हैं. ये तमाम युवा आईएएस-आईपीएस बनने के अपने सपने को साकार करने में जुटे हैं.

मौलान शमसुद्दीन कासमी इस मस्जिद के इमाम हैं. वह कहते हैं हमने अपने समुदाय के लोगों के सशक्तिकरण का यह नया तरीका खोज निकाला है. सिर्फ किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा वोट बैंक बने रहने से हमारी समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला.
कासमी कहते हैं, पिछले 18 सालों में तमिल नाडु से हमारे समाज का एक भी युवा आईएएस नहीं बन सका है. अब हमारी सोच है कि यह हालत बदलनी चाहिए.
मस्जिद कमेटी ने इसके लिए एक ट्रस्ट बनाया है और चालीस युवाओं को चयनित करके उन्हें आईएएस की तैयारी कराने के लिए हर तरह की मदद करता है. इस पर सालाना 30 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं.

कासमी कहते हैं समाज के लोग इस ट्रस्ट का खुल कर मदद कर रहे हैं. इमाम कासमी का मानना है कि ईमानदार नौकरशाह भ्रष्टचार का खात्मा कर सकते हैं. और ईमानदार नौकरशाह ही समाज की मदद भी कर सकते हैं. ट्रस्ट ने पिछले दो सालों में कॉलेज के छात्रों के बीच जागरूकता अभियान चलाया है ताकि इस प्रोग्राम से ज्यादा से ज्यादा छात्र जुड़ सकें.

इन चालीस होनहार युवओं के चयन के लिए निर्धारित चयन प्रक्रिया है. चयन के बाद छात्रों के रहने, खाने और पढ़ाई व कोचिंग से जुड़े तमाम खर्च ट्रस्ट खुद वहन करता है.
इमाम का कहना है कि फंड और ठहरने की व्यवस्था के अभाव के चलते फिलहाल इस प्रोग्राम का लाभ महिलाओं को नहीं मिल पा रहा है लेकिन हमारी कोशिश है कि इस कार्यक्रम में महिलाओं को भी शामिल किया जायेगा.

पहले बैच के दो छात्रों ने सिविल सर्विसेज की प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं.

मोहम्मद मीर साहिब उनमें से एक हैं. मीर इंजिनियिरिंग कर चुके हैं. उनका कहना है कि आईएएस अधिकारियों के पास असीम शक्ति होती है. ऐसे में वे समाज की मदद करने में सक्षम होते हैं. लेकिन आईएएस बनने का यह कत्तई मतलब नहीं कि कोई व्यक्ति सिर्फ अपने समुदाय की ही मदद करे, बल्कि वह अपने दायित्व से तमाम लोगों को लाभ पहुंचा सकता है.

देश में मुसलमानों की आबादी 14 प्रतिशत है लेकिन इस वर्ष महज 3 प्रतिशत मुसलमान प्रतिभागी ही सिविल सेवा परीक्षा में चयनित हो सके हैं. इस परीक्षा में इस वर्ष 30 मुस्लिम छात्रों ने सिविल सेवा परीक्षा पास की है.

साभार एनडीटीवी खबर

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