यह अखिलेश सरकार की नाकामी से उपजी बेचैनी है या मुलायम के अनुभवी नसीहत का असर या फिर दोनों? आखिर क्यों हफ्ता भर में सरकार ने तीन बड़े प्रशासनिक फेर बदल करके प्रशासनिक तंत्र में खलबली मचा दी है? ये हैं इसके चार कारण-

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

पिछली 9 फरवरी से लेकर 15 फरवरी तक यूपी सरकार ने तीन-तीन बड़े तबादलों के द्वारा जहां कमोबेश 40जिलों के डीएम और 41 जिलों के एसपी समेत 150 से ज्यादा आईएएस-आईपीएस का तबादला कर दिया है.

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पिछले एक महीने से समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह अपने बेटे मुख्यमंत्री से सख्त नाराज थे. उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से यह चिंता जता दी थी कि यूपी सरकार, मंत्री नहीं बल्कि नौकरशाह चला रहे हैं और यह एक खतरनाक स्थिति है. मुलायम ने अखिलेश को यहां तक कह दिया था कि नौकरशाही को बेलगाम छोड़ना पार्टी और राज्य दोनों के लिए नुकसानदेह है.

मुलायम की इस नसीहत और फटकार के बाद यूपी की नौकरशाही में आये इस आमूलचूल बदलाव को मुलायम की बेचैनी का नतीजा माना जा रहा है.

बदलाव के चार कारण

कारण नम्बर एक
दर असल पिछले साल मार्च में उत्तर प्रदेश में गद्दीनशीं होने के बाद अखिलेश सरकार जहां प्रशासनिक मोर्चे पर जबर्दस्त तरीके से नाकम साबित हुई है वहीं दूसरी तरफ भ्रष्ट नौकरशाहों की करतूतों के मद्देनजर कोर्ट की आलोचना भी उसे सहनी पड़ती रही है. नोएडा प्राधिकरण के सीईओ और आईएएस अधिकारी संजीव सरण मामले में तो इलाहबाद हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि उन्हें इस पद से हटाया जाये. सरण के ऊपर करोड़ों रुपये के घोटाले की जांच चल रही है. इसी तरह अनेक अन्य आईएएस-आईपीएस अधिकारी हैं जिनके भ्रष्ट आचरण के कारण अखिलेश यादव सरकार को शर्मशार होना पड़ा रहा था.

कारण नम्बर दो

इसी तरह मात्र दस महीने की गद्दीनशीनीं के बाद उत्तप्रदेश में आठ साम्प्रदायिक दंगों ने भी अखिलेश सरकार को अपमानित किया है. इन दंगों में आम तौर पर पुलिस अधिकारियों की लापरवाही की शिकायतें ही मिलती रही हैं.

मथुरा के कोसीकलां, प्रतापगढ़, बरेली, लखनऊ, इलाहाबाद और गाजियाबाद के अलावा फैजाबाद साम्प्रदायिक तनाव की चपेट में आ गये. इन दंगों में जबर्दस्त लूटपाट और आगजनी की घटनायें तो हुई हैं बेकसूरों को पुलिस द्वारा हवालात में बंदे करने और असल उत्पातियों को संरक्षण देने की शिकायतें आयीं. इस कारण मुलायम सिंह ने यह महसूस किया कि अल्पसंख्यकों के वोट बैंक के बूते बनी उनकी सरकार के लिए यह एक गंभीर खतरा है.

कारण नम्बर तीन

नौकरशाहों की करतूतों और सत्ता पर उनकी बेलगाम पकड़ से राजनीतिक कार्यकर्ता बेबस और बेचारे बन गये थे. बड़े पैमाने पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सीधा नेता जी तक यह शिकायत पहुंचानी शूरू कर दी थी कि डीएम एसपी प्रशासनिक कामों में अपनी मर्जी चलाते हैं और स्थानीय नेताओं की कोई सुनने वाला नहीं है. इस तरह के सैकड़ों आरोप से नेता जी भी बेचैन थे. जिस कारण उन्होंने महसूस कर लिया था कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में वह अपने कार्यकर्ताओं के बड़े वर्ग की सहानुभूति खो देंगे. इसलिए उन्होंने यह फैसला किया कि नौकरशाही पर नियंत्रण किया ही जाना चाहिए.

कारण नम्बर चार

उत्तप्रदेश की सरकार की तीन धूरी बन गई है. चाचा-भतीजा-चाचा की इस धूरी के कारण भी नौकरशाही बेलगाम थी. भले ही अखिलेश मुख्यमंत्री है पर सत्ता पर उनके चाचा शिवपाल सिंह यावद और आजम खान की भी काफी हद तक दखलअंदाजी रही है. जिसके कारण सत्ता के अनेक केंद्र बन गये थे. ऐसे में नौकरशाही पर मुख्यमंत्री का नियंत्रण न होने के काफी आरोप लगने लगे थे. मुलायम ने तब यहां तक कह दिया था कि अखिलेश यादव को यह सोचना होगा कि कैबिनेट और नौकरशाही के बीच समन्वय स्थापित हो. उनकी इन बातों में कई इशारे छुपे हुए थे.

अब जबकि प्रशासनिक फेर बदल का दौर लगभग पूरा हो चुका है, देखने की बात होगी अगले एक साल में अखिलेश यादव प्रशासनिक तौर पर कितनी दक्षता से उत्तर प्रदेश को आगे बढ़ा पाते हैं. और आगामी लोकसभा चुनावों में अपनी काबिलियत को किस हद तक भुना पाते हैं.

By Editor

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