भोपाल गैस कांड की दोषी कंपनी से भी गैरकानूनी तरीके से चंदा उगा लिया भाजपा और कांग्रेस ने Bhopal-gas-tragedy

अरुण सिंह

नौ साल पहले कांग्रेस की यूपीए सरकार ने जब आरटीआई लागू किया था तब सब दलों ने इतना विरोध नहीं किया था जितना अब कांग्रेस समेत सारे दल कर रहे हैं। जब तक सरकारी विभागों पर ये लागू था तो कोई दर्द नहीं लेकिन जैसे ही राजनीतिक दलों की ओर बढ़ा, राज खुलने के डर से सारे एक सुर में राग अलापने लगे।

कह रहे हैं कि आयकर को सब बता देते हैं लेकिन 90 फीसदी दानदाताओं के बारे में कोई नहीं जानता। कांग्रेस और बीजेपी जैसे दल हर साल अरबों का चंदा लेते हैं। पर कोई नहीं बता सकता कि उनकी थैली कौन भामाशाह भरता है? अब प्याज के छिलकों की तरह खबरें निकलकर बाहर आ रही हैं कि गैरकानूनी तरीकों से विदेशी कंपनियों से भी ये दोनों दल चंदा उगा रहे हैं। हद तो इस बात की है कि दोनों ने उस कंपनी से भी चंदा उगा लिया जिसकी वजह से भोपाल में गैस कांड हुआ था और हजारों लोगों को जान देनी पड़ी थी। यानी चंदा उगाही में हर स्तर पर कानून भी ताक पर और नैतिकता भी।

कानूनन 20 हजार रुपये से ज्यादा का चंदा होने पर ही दानदाता का नाम बताना जरूरी है और पार्टियां इसी का फायदा उठाती हैं। यही वजह है कि न सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी बल्कि, देश की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां केंद्रीय सूचना आयोग के उस फैसले से सकते में हैं जिसके तहत राजनीतिक दल आरटीआई के तहत आते हैं और उन्हें जनता को अपने आय-व्यय की जानकारी देनी होगी। 2009 से 2011 के बीच केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को पौने 8 अरब रुपये की आमदनी हुई। इसमें से पौने 5 अरब रुपये कूपन बेचकर मिले। 1 अरब 11 करोड़ 73 लाख रुपये चंदे से और 44 करोड़ 11 लाख रुपये ब्याज से मिले। लेकिन हैरान मत होइए कि महज 12 फीसदी चंदा ही 20 हजार से ऊपर की रकम के रूप में पार्टी को मिला, जिसमें दानदाताओं की जानकारी देनी होती है। यानी पार्टी ने ये जानकारी नहीं दी कि उसे बाकी के तकरीबन साढ़े छह अरब रुपये कहां से मिले? चाल, चरित्र और चेहरे वाली बीजेपी भी इसी राह पर है। बीजेपी को इन दो सालों में कुल सवा 4 अरब रुपये की आमदनी हुई। इसमें से तकरीबन साढ़े 3 अरब पार्टी को स्वैच्छिक दान से मिले। आजीवन सहयोग निधि के रूप में उसे तकरीबन 30 करोड़ रुपये और ब्याज से तकरीबन 3 करोड़ रुपये की कमाई हुई। यानी बीजेपी को भी महज 22 फीसदी रकम ही ऐसे दानदाताओं से मिली, जिन्होंने 20 हजार से ज्यादा की रकम चंदे में दी।

राजनीतिक दलों को चंदा हासिल करने के लिए विदेशी कंपनियों से भी परहेज नहीं है। वह भी तब जब यह पूरी तरह से गैरकानूनी है। राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाने का पुरजोर विरोध करने वाली कांग्रेस और भाजपा ने तो वर्ष 1984 में भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कंपनी डाउ केमिकल्स से भी चंदा लेने से गुरेज नहीं किया। इन दोनों ही दलों ने वर्ष 2003 से वर्ष 2011 के दौरान विदेशी कंपनियों से लगभग 30 करोड़ रुपये चंदे के रूप में स्वीकार किए। विदेशी कंपनियों से चंदा लेना असंवैधानिक है। यह फेरा के साथ-साथ जनप्रतिधित्व कानून का भी सीधा-सीधा उल्लंघन है।

इसके बावजूद वर्ष 2011 तक भाजपा और कांग्रेस ने छह विदेशी कंपनियों से क्रमश 19,42,50,000 रुपये और 9,83,50,000 रुपये लिए। जिन विदेशी कंपनियों से चंदा लिया गया उनमें डाउ केमिकल्स, वेदांत की मद्रास एल्युमिनियम कंपनी लि., सेसा गोवा लिमिटेड, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज इंडिया, सोलाराइज होल्डिंग्स और हयात रिजेंसी शामिल हैं। ये कंपनियां चंदे के रूप में बड़ी राशि दे कर अपने पक्ष में नीतियां तैयार कराने लगीं। अब राजनीतिक दल और सांसद खुद को संविधान से ऊपर मानते हैं। चूंकि चंदा बटोरने के मामले में सभी दल सही-गलत का ख्याल नहीं रखते, इसलिए सूचना मांगे जाने पर इन्हें परेशानी होती है। रोज नये घोटालों की खबर होती है। रोज स्टिंग आपरेशन होते हैं। रोज जांच की प्रक्रिया शुरु होती है। गिरफ्तारियां भी होती हैं। लेकिन राजनीति का खेल इतना पक्का है कि कहीं कुछ नहीं होता।

फिलहाल पार्टियों को डर है कि अगर सूचना का अधिकार उन पर लागू हो गया, तो नियमों की आड़ में जारी ये खेल खुल सकता है। गौर करने की बात है कि 2010 और 2011 के बीच में कांग्रेस को महज 417 लोगों ने ही बीस हजार रुपये से अधिक दान दिया। वहीं, बीजेपी में ये संख्या महज 502 है। तमिलनाडु में राज कर रही अन्नाद्रमुक और पंजाब में सत्ताधारी शिरोमणी अकाली दल और बीएसपी को किसी भी व्यक्ति ने 20 हजार से ज्यादा का चंदा नहीं दिया है। इन सबके बावजूद राजनीतिक दल खुद को पाक-साफ ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हर मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ दिखने वाले राजनीतिक दलों को केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले ने एकजुट कर दिया है। सिर्फ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई अकेली है जो पहले दिन से दलों को आरटीआई कानून के तहत लाने की हिमायत कर रही है।

By Editor


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