ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष एसआर दारापुरी ने कहा कि आज कल कभी औरंगजेब, कभी राणा सांगा और कभी शिवाजी के सवालों को अपनी-अपनी राजनीतिक चाल को साधने के लिए जो कोशिशें हो रही हैं, उसमें फंसने की जगह नागरिकों को आज के दौर का जो संकट हमारे देश के सामने मौजूद है उस पर सोचने समझने और एक मजबूत राजनीतिक कदम उठाने की जरूरत है। मैं देशवासियों से केवल यह कहना चाहता हूं कि जिस हिंदू राष्ट्र की अवधारणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दे रहा है वैसा हमारे देश के विकास का इतिहास कभी नहीं रहा है। सबको ज्ञात है कि जब छोटे-छोटे यूरोप के राष्ट्र आपस में लड़ रहे थे तब उन्होंने युद्ध समाप्त करने का रास्ता निकाला और 1648 में वेस्ट फेलिया समझौता किया, जिसके तहत मूलतः राष्ट्र राज्य की अवधारणा पैदा हुई। भारत, चीन और अरब देशों की सभ्यता का विकास उस रास्ते पर नहीं हुआ है जो यूरोप का रास्ता रहा है। भारत में रियासतें थी, छोटे-छोटे राज्य थे, सब अपनी-अपनी जागीर और क्षेत्र को बढ़ाने के लिए लड़ते थे। सभी की सेनाओं में अलग-अलग धर्म और पंथों के लोग बड़े-बड़े ओहदों पर थे। इसे धर्म के नाम पर लड़े जाने वाला युद्ध कहना दरअसल एक बड़ी राजनीतिक चाल का हिस्सा है, जिसे समझ कर मुकाबला करने की जरूरत है। संसद में जिस ढंग से सपा सांसद रामजीलाल सुमन ने बाबर और राणा सांगा प्रकरण में गद्दार शब्द का उपयोग किया है, वह यह दिखाता है कि सपा भी उसी राजनीतिक वैचारिकी के दायरे में फंसी हुई है जो राष्ट्र राज्य के बारे में आरएसएस की समझ है।
1857 के महत्व को रेखांकित करते हुए कुछ वर्ष पहले ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के संस्थापक सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने लेख में यह प्रतिपादित किया है कि साहू जी महाराज, ज्योतिबा फुले और डाक्टर अंबेडकर परंपरा ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध उसी तरह से थी जैसे अन्य धाराएं थी। लेकिन वे उन सामंती, वर्णवादी ताकतों को छोड़ देने के पक्ष में नहीं थे जिन्होंने हजारों साल से समाज के बड़े समुदाय को क्रूर और अमानवीय वर्ण व्यवस्था का शिकार बना दिया था। वर्तमान में देश में फिर से बर्बर राजनीति को परवान चढ़ाने के लिए ढेर सारी निजी सेनाओं को खड़ा किया जा रहा है। आज के दौर में ये सामंती, माफिया और कारपोरेट पूंजी की प्रतिनिधि हैं। जितनी निजी सेनाएं हैं उनके अगुवों की आप शिनाख्त करेंगे तो इस बात को आप बखूबी समझ लेंगे। इसी शिनाख्त के आधार पर एआईपीएफ विभिन्न क्षेत्रों के सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं से संपर्क में है और उसने एक संवाद की शुरुआत की है। 1857 के अपने लेख में अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने एक इंट्रो लिखा है जो आज के विवाद को समझने में मदद करेगा। इसलिए हम इस इंट्रो को पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं।