BJP का बिहार सरकार को गिराने का मिशन क्यों बार-बार हो रहा फेल

BJP का बिहार सरकार को गिराने का मिशन क्यों बार-बार हो रहा फेल

जब से बिहार में महागठबंधन सरकार बनी है, तब से रह-रह कर मीडिया में खबर चलती है कि बिहार सरकार तो गई। पर हो रहा उल्टा। भाजपा के नेता ही जदयू में गए।

जब से बिहार में महागठबंधन सरकार बनी है, तब से रह-रह कर मीडिया में खबर चलती है कि भाजपा की सरकार बनने वाली है। भाजपा के नेता कई बार दावा कर चुके हैं कि जदयू और राजद के कई विधायक उनके संपर्क में हैं। वे पाला बदलने वाले हैं। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले पांच महीने में जदयू और राजद के एक भी विधायक भाजपा में नहीं गए। दोनों दलों के एक भी प्रदेश स्तर के नेता भाजपा में नहीं गए। इसके विपरीत कुछ दिन पहले प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष राजीव रंजन जदयू में शामिल हो गए।

सबसे पहले जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को लेकर मीडिया में खूब खबरें चलीं कि जदयू के 35 विधायक भाजपा में जाने को तैयार हैं। बिहार में महाराष्ट्र की तरह दल-बदल की तैयारी है, लेकिन खुद आज आरसीपी सिंह सीन से गायब हैं। चर्चा से बाहर हैं। कुछ दिनों बाद फिर चर्चा हुई कि नीतीश कुमार पलटी मारने वाले हैं। लेकिन इसका भी हश्र हुआ उल्टाय़ नीतीश कुमार ने कह दिया कि 2025 में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा।

अब जनवरी, 2023 में एक बार फिर मीडिया में खूब खबरें चल रही हैं कि जदयू और राजद में पट नहीं रहा है। तेजस्वी यादव तुरत मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, इसीलिए नीतीश कुमार पर अपने विधायकों से दबाव बनवा रहे हैं। अंत में तेजस्वी यादव ने खुद कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन सरकार मजबूती से काम कर रही है।

अभी दो दिन पहले तेजस्वी यादव ने स्वीकार किया कि उनकी सरकार के खिलाफ षडयंत्र किया जा रहा है। इसके बाद एक बार फिर मीडिया में चर्चा चल पड़ी है कि सरकार गिरनेवाली है। लेकिन इस थ्योरी के उल्टा भी एक कहानी है। महागठबंधन का कोई बड़ा नेता भाजपा में नहीं गया, लेकिन भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष राजीव रंजन भाजपा छोड़कर जदयू में शामिल हो गए। मंगलवार को वीआईपी के प्रदेश महासचिव और लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी रह चुके बाल मुकुंद चौहान जदयू में शामिल हो गए।

आखिर महाराष्ट्र मॉडल बिहार में क्यों बार-बार फेल हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण तो जदयू-राजद की एकता है। गोपालगंज और कुढ़नी में हार के बाद माहौल बनाने की कोशिश की गई कि महागठबंधन का जनाधार दरक गया है। भाजपा की तरफ चला गया है, पर सच्चाई यह नहीं है। सच्चाई यह रहती तो सचमुच दल-बदल का तांता लग जाता। सच्चाई यही है कि यहां की माटी महाराष्ट्र और यूपी से अलग है। यहां भाजपा चाहकर भी अकेले चुनाव लड़कर बहुमत नहीं ला सकती। कहने को कोई दावा कछु भी करे, पर बीस वर्षों के चुनाव यही बताते हैं कि भाजपा अकेले चुनाव लड़े, तो वह सिमटती है। यही कारण है कि बिहार के महागठबंधन विधायक न बिकते दिख रहे हैं, न डरते। मालूम हो कि राजद के कई विधायकों-सांसदों के यहां केंद्रीय एजेंसियों के छापे पड़ चुके हैं। आगे भी पड़ेंगे, लेकिन विधायक टूट कर दल बदल करेंगे, इसकी संभावना बहुत कम है। भाजपा को सरकार बनाने के लिए 40 से ज्यादा विधायक चाहिए।

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