भाजपा ने अबतक नहीं की कंगना की निंदा, बताइए क्यों?

भाजपा ने अबतक नहीं की कंगना की निंदा, बताइए क्यों?

पद्मश्री कंगना रनौत ने कहा कि 1947 में भीख मिली थी। आजादी तो 2014 में मिली। भाजपा के किसी बड़े नेता ने अबतक कंगना की निंदा नहीं की। बताइए क्यों?

कुमार अनिल

देशभर से लोग कंगना रनौत का पद्मश्री पुरस्कार वापस लेने की मांग कर रहे हैं। बिहार में एनडीए में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के बाद आज एनसीपी ने भी कंगना का पद्मश्री वापस लेने की मांग की है। सोशल मीडिया पर लोग थू-थू कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के किसी बड़े नेता, किसी तथाकथित राष्ट्रवादी नेता ने कंगना रनौत के बयान की निंदी तक नहीं की है।

युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवास ने कहा-क्या BJP के किसी भी ‘राष्ट्रवादी’ नेता ने ‘भीख में मिली’ आजादी वाले बयान का विरोध किया या फिर उनकी भी यही राय है? कांग्रेस प्रवक्ता गुरदीप सिंह सप्पल एक एक टीवी चैनल की चर्चा में शामिल थे। उन्होंने जब कहा कि कंगना रनौत ने स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों का अपमान किया है। क्या भाजपा और संघ के नेता क्या इसकी निंदा करते हैं, तो एंकर ने सवाल को डिरेल करने की बहुत कोशिश की, लेकिन सप्पल जोर देते रहे। सप्पल ने ट्वीट किया-आधे घंटे के प्रोग्राम में BJP के प्रवक्ता और RSS के प्रवक्ता स्वाधीनता सेनानियों के अपमान की निंदा में एक लाइन नहीं बोल सके। एक लाइन नहीं बोल सके कि भारत की आज़ादी भीख में नहीं मिली है।

इस बीच टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल ने सफाई दी है। इसी चैनल में इंटरव्यू देते हुए पद्मश्री कंगना ने नया ज्ञान दिया था। टाइम्स नाऊ ने ट्वीट किया- हो सकता है कंगना रनौत समझती हों कि आजादी 2014 में मिली, लेकिन इसे कोई भी सच्चा भारतीय स्वीकार नहीं कर सकता। यह लाखों स्वाधीनता सेनानियों का अपमान है। उनके बलिदान के कारण ही हम आज आजाद हैं।

टाइम्स नाऊ के ट्वीट के बाद लोग पूछ रहे हैं कि इंटरव्यू लेने वाली नविका कुमार ने कंगना द्वारा देश का अपमान करने पर विरोध क्यों नहीं किया, बल्कि उल्टे तालियां बजीं। कई लोगों ने नविका कुमार को चैनल से बाहर करने की मांग की है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कंगना ने देश का अपमान किया, लेकिन भाजपा और संघ के एक भी बड़े नेता ने अबतक निंदा क्यों नहीं की? प्रधानमंत्री मोदी छोटी-छोटी बातों पर ट्वीट करते हैं, लेकिन राष्ट्र के अपमान पर चुप क्यों हैं? पहले गोडसे का खुलेआम समर्थन करने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था, लेकिन न्यू इंडिया में धीरे-धीरे गोडसे का समर्थन अब सार्वजनिक हो गया है। अंग्रेजों से पेंशन पानेवाले, माफी मांगनेवाले सावरकर को क्रांतिकारी साबित करने की खुद सरकार में बैठे लोग कोशिश कर रहे हैं। तो क्या अब आजादी के पूरे आंदोलन को नकारने और प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद आजादी मिलने की बात स्थापित करने की कोशिश शुरू हो गई है। आज सरकार, भाजपा, संघ के लोग कंगना की निंदा नहीं कर रहे हैं। बचाव करने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई है, लेकिन संभव है, कल खुलकर कंगना का समर्थन किया जाए। आखिर इतिहास के पुनर्लेखन की बात भाजपा-संघ के लोग कहते ही रहते हैं। तो क्या यह हमारे इतिहास को बदलने की कोशिश हो रही है? आप भी सोचिए और बोलिए।

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