EBC आरक्षण खत्म नहीं, बल्कि 20 से बढ़कर हो सकता है 33 फीसदी

EBC आरक्षण खत्म नहीं, बल्कि 20 से बढ़कर हो सकता है 33 फीसदी

अति पिछड़ों के लिए दशकों से संघर्ष करनेवाले किशोरी दास ने कहा बिहार में हिंदू-मुस्लिम अतिपिछड़ों की आबादी 40 प्रतिशत है, पर आरक्षण सिर्फ 20 प्रतिशत मिल रहा।

इर्शादुल हक, संपादक नौकरशाही डॉट कॉम

पटना हाई कोर्ट ने जब अतिपिछड़ों के आरक्षण को खत्म करके उसे सामान्य घोषित करते हुए नगर निकाय चुनाव कराने का निर्देश दिया, तो एक बारगी लगा कि बिहार में अतिपिछड़ों को मिलनेवाला आरक्षण खत्म हो जाएगा। नगर निकायों में अतिपिछड़ों को 20 प्रतिशत आरक्षण मिलता रहा है। अतिपिछड़ों के लिए दशकों से सड़क से लेकर कोर्ट तक संघर्ष करनेवाले किशोरी दास ने नौकरशाही डॉट कॉम से विशेष बातचीत में कहा कि अति पिछड़ों की हकमारी हुई है। बिहार में हिंदू और मुस्लिम अति पिछड़ों की आबादी 40 प्रतिशत है, लेकिन उन्हें केवल 20 प्रतिशत ही आरक्षण मिल रहा है। यह बढ़कर 33 प्रतिशत हो सकता है।

किशोरी दास ने कहा कि 1953 से ही पिछड़ा और अति पिछड़ा की श्रेणी रही है। मुंगेरी लाल कमीशन ने प्रदेश की 94 जातियों को अतिपिछड़ी जातियां मानी। 2006 में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ों को आरक्षण की दिशा में कार्य शुरू किया, तो पहले उन्होंने कहा कि निकाय चुनाव में 30 प्रतिशत आरक्षण देंगे। बाद में जब सर्कुलर निकला तो इसे घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया। तब भी हमलोगों ने सवाल उठाया कि अति पिछड़ों की आबादी 40 प्रतिशत है, तो हमारा हिस्सा कम क्यों किया जा रहा है।

किशोरी दास ने कहा कि 2007 में अतिपिछड़ों को 20 प्रतिशत, 16 प्रतिशत अनुसूचित जातियों को तथा एक प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों को अर्थात कुल 37 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि आरक्षण 50 प्रतिशत होगा, तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार अब भी 13 प्रतिशत आरक्षण बिहार सरकार ने चुरा कर रखा है।

क्या यह संभव है कि अतिपिछड़ों का आरक्षण 20 से बढ़कर 33 प्रतिशत हो, इस सवाल के जवाब में किशोरी दास ने कहा कि राज्य सरकार के पास आरक्षण का कोटा बचा हुआ है। अगर अतिपिछड़ों ने अपने आंदोलन से दबाव बनाया, तो बिल्कुल संभव है कि उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण मिले। उन्होंने यह भी कहा कि मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है कि तेली और दांगी जाति का राजनीतिक प्रतिनिधित्व समुचित है। इसलिए इन्हें अतिपिछड़ा में शामिल करने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बावजूद नीतीश सरकार ने आयोग के मूल्यांकन के खिलाफ जाकर केवल राजनीतिक लाभ के लिए इन दोनों जातियों को अतिपिछड़ा में शामिल कर लिया। इस निर्णय के खिलाफ हमने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इन दो जातियों के कारण कमजोर अतिपिछड़ों का हक मारा जा रहा है।

पटना हाईकोर्ट के निर्देश के बाद वंचितों में चिंता थी, तभी हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की गई। इसे वरिष्ठ अधिवक्ता बसंत कुमार चौधरी सहित कई अन्य जिसमें बिहार सरकार भी शामिल थी, ने दायर की। इसके बाद सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अतिपिछड़ों को आरक्षण सीमा तय करने के लिए कमीशन बनाने पर सहमति दी। अतिपिछड़ा आरक्षण बचाओ मोर्चा ने राज्यव्यापी अभियान की शुरुआत कर दी है।

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